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अयोध्याकाण्ड दोहा 217

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चौपाई :जड़ चेतन मग जीव घनेरे। जे चितए प्रभु जिन्ह प्रभु हेरे॥ते सब भए परम पद जोगू। भरत दरस मेटा भव रोगू॥1॥ भावार्थ:- रास्ते में असंख्य जड़-चेतन जीव थे। उनमें से जिनको प्रभु श्री रामचंद्रजी ने देखा, अथवा जिन्होंने प्रभु श्री रामचंद्

अयोध्याकाण्ड दोहा 216

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चौपाई :कीन्ह निमज्जनु तीरथराजा। नाई मुनिहि सिरु सहित समाजा।रिषि आयसु असीस सिर राखी। करि दंडवत बिनय बहु भाषी॥1॥ भावार्थ:- (प्रातःकाल) भरतजी ने तीर्थराज में स्नान किया और समाज सहित मुनि को सिर नवाकर और ऋषि की आज्ञा तथा आशीर्वाद को 

अयोध्याकाण्ड दोहा 215

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चौपाई :मुनि प्रभाउ जब भरत बिलोका। सब लघु लगे लोकपति लोका॥सुख समाजु नहिं जाइ बखानी। देखत बिरति बिसारहिं ग्यानी॥1॥ भावार्थ:- जब भरतजी ने मुनि के प्रभाव को देखा, तो उसके सामने उन्हें (इन्द्र, वरुण, यम, कुबेर आदि) सभी लोकपालों के लोक तु

अयोध्याकाण्ड दोहा 214

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चौपाई :रिधि सिधि सिर धरि मुनिबर बानी। बड़भागिनि आपुहि अनुमानी॥कहहिं परसपर सिधि समुदाई। अतुलित अतिथि राम लघु भाई॥1॥ भावार्थ:- ऋद्धि-सिद्धि ने मुनिराज की आज्ञा को सिर चढ़ाकर अपने को बड़भागिनी समझा। सब सिद्धियाँ आपस में कहने लगीं- श्

अयोध्याकाण्ड दोहा 213

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चौपाई :सुनि मुनि बचन भरत हियँ सोचू। भयउ कुअवसर कठिन सँकोचू॥जानि गुरुइ गुर गिरा बहोरी। चरन बंदि बोले कर जोरी॥1॥ भावार्थ:- मुनि के वचन सुनकर भरत के हृदय में सोच हुआ कि यह बेमौके बड़ा बेढब संकोच आ पड़ा! फिर गुरुजनों की वाणी को महत्वपूर्

अयोध्याकाण्ड दोहा 212

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चौपाई :एहि दुख दाहँ दहइ दिन छाती। भूख न बासर नीद न राती॥एहि कुरोग कर औषधु नाहीं। सोधेउँ सकल बिस्व मन माहीं॥1॥ भावार्थ:- इसी दुःख की जलन से निरंतर मेरी छाती जलती रहती है। मुझे न दिन में भूख लगती है, न रात को नींद आती है। मैंने मन ही मन 

अयोध्याकाण्ड दोहा 211

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चौपाई :मुनि समाजु अरु तीरथराजू। साँचिहुँ सपथ अघाइ अकाजू॥एहिं थल जौं किछु कहिअ बनाई। एहि सम अधिक न अघ अधमाई॥1॥ भावार्थ:- मुनियों का समाज है और फिर तीर्थराज है। यहाँ सच्ची सौगंध खाने से भी भरपूर हानि होती है। इस स्थान में यदि कुछ बन

अयोध्याकाण्ड दोहा 210

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चौपाई :कीरति बिधु तुम्ह कीन्ह अनूपा। जहँ बस राम पेम मृगरूपा॥तात गलानि करहु जियँ जाएँ। डरहु दरिद्रहि पारसु पाएँ॥1॥ भावार्थ:- (परन्तु उनसे भी बढ़कर) तुमने कीर्ति रूपी अनुपम चंद्रमा को उत्पन्न किया, जिसमें श्री राम प्रेम ही हिरन के (