अयोध्याकाण्ड दोहा 193
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चौपाई :लखब सनेहु सुभायँ सुहाएँ। बैरु प्रीति नहिं दुरइँ दुराएँ॥अस कहि भेंट सँजोवन लागे। कंद मूल फल खग मृग मागे॥1॥ भावार्थ:- उनके सुंदर स्वभाव से मैं उनके स्नेह को पहचान लूँगा। वैर और प्रेम छिपाने से नहीं छिपते। ऐसा कहकर वह भेंट का