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अयोध्याकाण्ड दोहा 185

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चौपाई :भा सब कें मन मोदु न थोरा। जनु घन धुनि सुनि चातक मोरा॥चलत प्रात लखि निरनउ नीके। भरतु प्रानप्रिय भे सबही के॥1॥ भावार्थ:- सबके मन में कम आनंद नहीं हुआ (अर्थात बहुत ही आनंद हुआ)! मानो मेघों की गर्जना सुनकर चातक और मोर आनंदित हो रह

अयोध्याकाण्ड दोहा 184

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चौपाई :भरत बचन सब कहँ प्रिय लागे। राम सनेह सुधाँ जनु पागे॥लोग बियोग बिषम बिष दागे। मंत्र सबीज सुनत जनु जागे॥1॥ भावार्थ:- भरतजी के वचन सबको प्यारे लगे। मानो वे श्री रामजी के प्रेमरूपी अमृत में पगे हुए थे। श्री रामवियोग रूपी भीषण व

अयोध्याकाण्ड दोहा 183

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चौपाई :आन उपाउ मोहि नहिं सूझा। को जिय कै रघुबर बिनु बूझा॥एकहिं आँक इहइ मन माहीं। प्रातकाल चलिहउँ प्रभु पाहीं॥1॥ भावार्थ:- मुझे दूसरा कोई उपाय नहीं सूझता। श्री राम के बिना मेरे हृदय की बात कौन जान सकता है? मन में एक ही आँक (निश्चयपू

अयोध्याकांड दोहा 182

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चौपाई :गुर बिबेक सागर जगु जाना। जिन्हहि बिस्व कर बदर समाना॥मो कहँ तिलक साज सज सोऊ। भएँ बिधि बिमुख बिमुख सबु कोऊ॥1॥ भावार्थ:- गुरुजी ज्ञान के समुद्र हैं, इस बात को सारा जगत्‌ जानता है, जिसके लिए विश्व हथेली पर रखे हुए बेर के समान है, 

अयोध्याकांड दोहा 181

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चौपाई :कैकइ सुअन जोगु जग जोई। चतुर बिरंचि दीन्ह मोहि सोई॥दसरथ तनय राम लघु भाई। दीन्हि मोहि बिधि बादि बड़ाई॥1॥ भावार्थ:- कैकेयी के लड़के के लिए संसार में जो कुछ योग्य था, चतुर विधाता ने मुझे वही दिया। पर ‘दशरथजी का पुत्र’ और ‘राम का छ

अयोध्याकांड दोहा 180

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चौपाई :कैकेई भव तनु अनुरागे। पावँर प्रान अघाइ अभागे॥जौं प्रिय बिरहँ प्रान प्रिय लागे। देखब सुनब बहुत अब आगे॥1॥ भावार्थ:- कैकेयी से उत्पन्न देह में प्रेम करने वाले ये पामर प्राण भरपेट (पूरी तरह से) अभागे हैं। जब प्रिय के वियोग में 

अयोध्याकांड दोहा 179

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चौपाई :कहउँ साँचु सब सुनि पतिआहू। चाहिअ धरमसील नरनाहू॥मोहि राजु हठि देइहहु जबहीं। रसा रसातल जाइहि तबहीं॥1॥ भावार्थ:- मैं सत्य कहता हूँ, आप सब सुनकर विश्वास करें, धर्मशील को ही राजा होना चाहिए। आप मुझे हठ करके ज्यों ही राज्य देंगे

अयोध्याकांड दोहा 178

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चौपाई :हित हमार सियपति सेवकाईं। सो हरि लीन्ह मातु कुटिलाईं॥मैं अनुमानि दीख मन माहीं। आन उपायँ मोर हित नाहीं॥1॥ भावार्थ:- मेरा कल्याण तो सीतापति श्री रामजी की चाकरी में है, सो उसे माता की कुटिलता ने छीन लिया। मैंने अपने मन में अनु