अयोध्याकाण्ड दोहा 185
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चौपाई :भा सब कें मन मोदु न थोरा। जनु घन धुनि सुनि चातक मोरा॥चलत प्रात लखि निरनउ नीके। भरतु प्रानप्रिय भे सबही के॥1॥ भावार्थ:- सबके मन में कम आनंद नहीं हुआ (अर्थात बहुत ही आनंद हुआ)! मानो मेघों की गर्जना सुनकर चातक और मोर आनंदित हो रह