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अयोध्याकाण्ड दोहा 225

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चौपाई :मंगल सगुन होहिं सब काहू। फरकहिं सुखद बिलोचन बाहू॥भरतहि सहित समाज उछाहू। मिलिहहिं रामु मिटिहि दुख दाहू॥1॥ भावार्थ: -सबको मंगलसूचक शकुन हो रहे हैं। सुख देने वाले (पुरुषों के दाहिने और स्त्रियों के बाएँ) नेत्र और भुजाएँ फड़क 

अयोध्याकाण्ड दोहा 224

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चौपाई :निज गुन सहित राम गुन गाथा। सुनत जाहिं सुमिरत रघुनाथा॥तीरथ मुनि आश्रम सुरधामा। निरखि निमज्जहिं करहिं प्रनामा॥1॥ भावार्थ:- (इस प्रकार) अपने गुणों सहित श्री रामचंद्रजी के गुणों की कथा सुनते और श्री रघुनाथजी को स्मरण करते हु

अयोध्याकाण्ड दोहा 223

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चौपाई :भायप भगति भरत आचरनू। कहत सुनत दुख दूषन हरनू॥जो किछु कहब थोर सखि सोई। राम बंधु अस काहे न होई॥1॥ भावार्थ:- भरतजी का भाईपना, भक्ति और इनके आचरण कहने और सुनने से दुःख और दोषों के हरने वाले हैं। हे सखी! उनके संबंध में जो कुछ भी कहा ज

अयोध्याकाण्ड दोहा 222

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चौपाई :कहहिं सप्रेम एक एक पाहीं। रामु लखनु सखि होहिं कि नाहीं॥बय बपु बरन रूपु सोइ आली। सीलु सनेहु सरिस सम चाली॥1॥ भावार्थ:- गाँवों की स्त्रियाँ एक-दूसरे से प्रेमपूर्वक कहती हैं- सखी! ये राम-लक्ष्मण हैं कि नहीं? हे सखी! इनकी अवस्था, श

अयोध्याकाण्ड दोहा 221

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चौपाई :जमुन तीर तेहि दिन करि बासू। भयउ समय सम सबहि सुपासू॥रातिहिं घाट घाट की तरनी। आईं अगनित जाहिं न बरनी॥1॥ भावार्थ:- उस दिन यमुनाजी के किनारे निवास किया। समयानुसार सबके लिए (खान-पान आदि की) सुंदर व्यवस्था हुई (निषादराज का संकेत प

अयोध्याकाण्ड दोहा 220

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चौपाई :सत्यसंध प्रभु सुर हितकारी। भरत राम आयस अनुसारी॥स्वारथ बिबस बिकल तुम्ह होहू। भरत दोसु नहिं राउर मोहू॥1॥ भावार्थ:- प्रभु श्री रामचंद्रजी सत्यप्रतिज्ञ और देवताओं का हित करने वाले हैं और भरतजी श्री रामजी की आज्ञा के अनुसार 

अयोध्याकाण्ड दोहा 219

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चौपाई :सुनु सुरेस उपदेसु हमारा। रामहि सेवकु परम पिआरा॥मानत सुखु सेवक सेवकाईं। सेवक बैर बैरु अधिकाईं॥1॥ भावार्थ:- हे देवराज! हमारा उपदेश सुनो। श्री रामजी को अपना सेवक परम प्रिय है। वे अपने सेवक की सेवा से सुख मानते हैं और सेवक के 

अयोध्याकाण्ड दोहा 218

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चौपाई :बचन सुनत सुरगुरु मुसुकाने। सहसनयन बिनु लोचन जाने॥मायापति सेवक सन माया। करइ त उलटि परइ सुरराया॥1॥ भावार्थ:- इंद्र के वचन सुनते ही देवगुरु बृहस्पतिजी मुस्कुराए। उन्होंने हजार नेत्रों वाले इंद्र को (ज्ञान रूपी) नेत्रोंरहि