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अयोध्याकाण्ड दोहा 209

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चौपाई :नव बिधु बिमल तात जसु तोरा। रघुबर किंकर कुमुद चकोरा॥उदित सदा अँथइहि कबहूँ ना। घटिहि न जग नभ दिन दिन दूना॥1॥ भावार्थ:- हे तात! तुम्हारा यश निर्मल नवीन चन्द्रमा है और श्री रामचन्द्रजी के दास कुमुद और चकोर हैं (वह चन्द्रमा तो प्

अयोध्याकाण्ड दोहा 208

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चौपाई :सो तुम्हार धनु जीवनु प्राना। भूरिभाग को तुम्हहि समाना॥यह तुम्हार आचरजु न ताता। दसरथ सुअन राम प्रिय भ्राता॥1॥ भावार्थ:- सो वह (श्री रामचन्द्रजी के चरणों का प्रेम) तो तुम्हारा धन, जीवन और प्राण ही है, तुम्हारे समान बड़भागी कौ

अयोध्याकाण्ड दोहा 207

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चौपाई :यहउ कहत भल कहिहि न कोऊ। लोकु बेदु बुध संमत दोऊ॥तात तुम्हार बिमल जसु गाई। पाइहि लोकउ बेदु बड़ाई॥1॥ भावार्थ:- यह कहते भी कोई भला न कहेगा, क्योंकि लोक और वेद दोनों ही विद्वानों को मान्य है, किन्तु हे तात! तुम्हारा निर्मल यश गाकर त

अयोध्याकाण्ड दोहा 206

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चौपाई :प्रमुदित तीरथराज निवासी। बैखानस बटु गृही उदासी॥कहहिं परसपर मिलि दस पाँचा। भरत सनेहु सीलु सुचि साँचा॥1॥ भावार्थ:- तीर्थराज प्रयाग में रहने वाले वनप्रस्थ, ब्रह्मचारी, गृहस्थ और उदासीन (संन्यासी) सब बहुत ही आनंदित हैं और दस

अयोध्याकाण्ड दोहा 205

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चौपाई :जानहुँ रामु कुटिल करि मोही। लोग कहउ गुर साहिब द्रोही॥सीता राम चरन रति मोरें। अनुदिन बढ़उ अनुग्रह तोरें॥1॥ भावार्थ:- स्वयं श्री रामचंद्रजी भी भले ही मुझे कुटिल समझें और लोग मुझे गुरुद्रोही तथा स्वामी द्रोही भले ही कहें, पर 

अयोध्याकाण्ड दोहा 204

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चौपाई :झलका झलकत पायन्ह कैसें। पंकज कोस ओस कन जैसें॥भरत पयादेहिं आए आजू। भयउ दुखित सुनि सकल समाजू॥1॥ भावार्थ:- उनके चरणों में छाले कैसे चमकते हैं, जैसे कमल की कली पर ओस की बूँदें चमकती हों। भरतजी आज पैदल ही चलकर आए हैं, यह समाचार सु

अयोध्याकाण्ड दोहा 203

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चौपाई :कियउ निषादनाथु अगुआईं। मातु पालकीं सकल चलाईं॥साथ बोलाइ भाइ लघु दीन्हा। बिप्रन्ह सहित गवनु गुर कीन्हा॥1॥ भावार्थ:- निषादराज को आगे करके पीछे सब माताओं की पालकियाँ चलाईं। छोटे भाई शत्रुघ्नजी को बुलाकर उनके साथ कर दिया। फ

अयोध्याकाण्ड दोहा 202

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चौपाई :सखा बचन सुनि उर धरि धीरा। बास चले सुमिरत रघुबीरा॥यह सुधि पाइ नगर नर नारी। चले बिलोकन आरत भारी॥1॥ भावार्थ:- सखा के वचन सुनकर, हृदय में धीरज धरकर श्री रामचंद्रजी का स्मरण करते हुए भरतजी डेरे को चले। नगर के सारे स्त्री-पुरुष यह