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अयोध्याकाण्ड दोहा 201

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चौपाई :राम सुना दुखु कान न काऊ। जीवनतरु जिमि जोगवइ राउ॥पलक नयन फनि मनि जेहि भाँती। जोगवहिं जननि सकल दिन राती॥1॥ भावार्थ:- श्री रामचंद्रजी ने कानों से भी कभी दुःख का नाम नहीं सुना। महाराज स्वयं जीवन वृक्ष की तरह उनकी सार-सँभाल किय

अयोध्याकाण्ड दोहा 200

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चौपाई :लालन जोगु लखन लघु लोने। भे न भाइ अस अहहिं न होने॥पुरजन प्रिय पितु मातु दुलारे। सिय रघुबीरहि प्रानपिआरे॥1॥ भावार्थ:- मेरे छोटे भाई लक्ष्मण बहुत ही सुंदर और प्यार करने योग्य हैं। ऐसे भाई न तो किसी के हुए, न हैं, न होने के ही हैं

अयोध्याकाण्ड दोहा 199

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चौपाई :कुस साँथरी निहारि सुहाई। कीन्ह प्रनामु प्रदच्छिन जाई॥चरन देख रज आँखिन्ह लाई। बनइ न कहत प्रीति अधिकाई॥1॥ भावार्थ:- कुशों की सुंदर साथरी देखकर उसकी प्रदक्षिणा करके प्रणाम किया। श्री रामचन्द्रजी के चरण चिह्नों की रज आँखों

अयोध्याकाण्ड दोहा 198

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चौपाई :जहँ तहँ लोगन्ह डेरा कीन्हा। भरत सोधु सबही कर लीन्हा॥सुर सेवा करि आयसु पाई। राम मातु पहिं गे दोउ भाई॥1॥ भावार्थ:- लोगों ने जहाँ-तहाँ डेरा डाल दिया। भरतजी ने सभी का पता लगाया (कि सब लोग आकर आराम से टिक गए हैं या नहीं)। फिर देव पू

अयोध्याकाण्ड दोहा 197

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चौपाई :सृंगबेरपुर भरत दीख जब। भे सनेहँ सब अंग सिथिल तब॥सोहत दिएँ निषादहि लागू। जनु तनु धरें बिनय अनुरागू॥1॥ भावार्थ:- भरतजी ने जब श्रृंगवेरपुर को देखा, तब उनके सब अंग प्रेम के कारण शिथिल हो गए। वे निषाद को लाग दिए (अर्थात उसके कंधे

अयोध्याकाण्ड दोहा 196

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चौपाई :कपटी कायर कुमति कुजाती। लोक बेद बाहेर सब भाँती॥राम कीन्ह आपन जबही तें। भयउँ भुवन भूषन तबही तें॥1॥ भावार्थ:- मैं कपटी, कायर, कुबुद्धि और कुजाति हूँ और लोक-वेद दोनों से सब प्रकार से बाहर हूँ। पर जब से श्री रामचन्द्रजी ने मुझे 

अयोध्याकाण्ड दोहा 195

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चौपाई :नहिं अचिरिजु जुग जुग चलि आई। केहि न दीन्हि रघुबीर बड़ाई॥राम नाम महिमा सुर कहहीं। सुनि सुनि अवध लोग सुखु लहहीं॥1॥ भावार्थ:- इसमें कोई आश्चर्य नहीं है, युग-युगान्तर से यही रीति चली आ रही है। श्री रघुनाथजी ने किसको बड़ाई नहीं दी?

अयोध्याकाण्ड दोहा 194

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चौपाई :भेंटत भरतु ताहि अति प्रीती। लोग सिहाहिं प्रेम कै रीती॥धन्य धन्य धुनि मंगल मूला। सुर सराहि तेहि बरिसहिं फूला॥1॥ भावार्थ:- भरतजी गुह को अत्यन्त प्रेम से गले लगा रहे हैं। प्रेम की रीति को सब लोग सिहा रहे हैं (ईर्षापूर्वक प्रश