बालकांड दोहा 227
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चौपाई :सकल सौच करि जाइ नहाए। नित्य निबाहि मुनिहि सिर नाए॥समय जानि गुर आयसु पाई। लेन प्रसून चले दोउ भाई॥1॥भावार्थ:- सब शौचक्रिया करके वे जाकर नहाए। फिर (संध्या-अग्निहोत्रादि) नित्यकर्म समाप्त करके उन्होंने मुनि को मस्तक नवाया। (पू