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बालकांड दोहा 227

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चौपाई :सकल सौच करि जाइ नहाए। नित्य निबाहि मुनिहि सिर नाए॥समय जानि गुर आयसु पाई। लेन प्रसून चले दोउ भाई॥1॥भावार्थ:- सब शौचक्रिया करके वे जाकर नहाए। फिर (संध्या-अग्निहोत्रादि) नित्यकर्म समाप्त करके उन्होंने मुनि को मस्तक नवाया। (पू

बालकांड दोहा 226

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चौपाई :निसि प्रबेस मुनि आयसु दीन्हा। सबहीं संध्याबंदनु कीन्हा॥कहत कथा इतिहास पुरानी। रुचिर रजनि जुग जाम सिरानी॥1॥भावार्थ:- रात्रि का प्रवेश होते ही (संध्या के समय) मुनि ने आज्ञा दी, तब सबने संध्यावंदन किया। फिर प्राचीन कथाएँ तथा 

बालकांड दोहा 225

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चौपाई :सिसु सब राम प्रेमबस जाने। प्रीति समेत निकेत बखाने॥निज निज रुचि सब लेहिं बोलाई। सहित सनेह जाहिं दोउ भाई॥1॥भावार्थ:- श्री रामचन्द्रजी ने सब बालकों को प्रेम के वश जानकर (यज्ञभूमि के) स्थानों की प्रेमपूर्वक प्रशंसा की। (इससे बा

बालकांड दोहा 224

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चौपाई :पुर पूरब दिसि गे दोउ भाई। जहँ धनुमख हित भूमि बनाई॥अति बिस्तार चारु गच ढारी। बिमल बेदिका रुचिर सँवारी॥1॥भावार्थ:- दोनों भाई नगर के पूरब ओर गए, जहाँ धनुषयज्ञ के लिए (रंग) भूमि बनाई गई थी। बहुत लंबा-चौड़ा सुंदर ढाला हुआ पक्का आँगन 

बालकांड दोहा 223

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चौपाई :बोली अपर कहेहु सखि नीका। एहिं बिआह अति हित सबही का।कोउ कह संकर चाप कठोरा। ए स्यामल मृदु गात किसोरा॥1॥भावार्थ:- दूसरी ने कहा- हे सखी! तुमने बहुत अच्छा कहा। इस विवाह से सभी का परम हित है। किसी ने कहा- शंकरजी का धनुष कठोर है और ये स

बालकांड दोहा 222

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चौपाई :देखि राम छबि कोउ एक कहई। जोगु जानकिहि यह बरु अहई॥जौं सखि इन्हहि देख नरनाहू। पन परिहरि हठि करइ बिबाहू॥1॥भावार्थ:-श्री रामचन्द्रजी की छबि देखकर कोई एक (दूसरी सखी) कहने लगी- यह वर जानकी के योग्य है। हे सखी! यदि कहीं राजा इन्हें दे

बालकांड दोहा 221

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चौपाई :कहहु सखी अस को तनु धारी। जो न मोह यह रूप निहारी॥कोउ सप्रेम बोली मृदु बानी। जो मैं सुना सो सुनहु सयानी॥1॥भावार्थ:- हे सखी! (भला) कहो तो ऐसा कौन शरीरधारी होगा, जो इस रूप को देखकर मोहित न हो जाए (अर्थात यह रूप जड़-चेतन सबको मोहित करने 

बालकांड दोहा 220

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चौपाई :देखन नगरु भूपसुत आए। समाचार पुरबासिन्ह पाए॥धाए धाम काम सब त्यागी। मनहुँ रंक निधि लूटन लागी॥1॥भावार्थ:- जब पुरवासियों ने यह समाचार पाया कि दोनों राजकुमार नगर देखने के लिए आए हैं, तब वे सब घर-बार और सब काम-काज छोड़कर ऐसे दौड़े मा