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बालकांड दोहा 203

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चौपाई :बालचरित हरि बहुबिधि कीन्हा। अति अनंद दासन्ह कहँ दीन्हा॥कछुक काल बीतें सब भाई। बड़े भए परिजन सुखदाई॥1॥भावार्थ:- भगवान ने बहुत प्रकार से बाललीलाएँ कीं और अपने सेवकों को अत्यन्त आनंद दिया। कुछ समय बीतने पर चारों भाई बड़े होकर क

बालकांड दोहा 202

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चौपाई :अगनित रबि ससि सिव चतुरानन। बहु गिरि सरित सिंधु महि कानन॥काल कर्म गुन ग्यान सुभाऊ। सोउ देखा जो सुना न काऊ॥1॥भावार्थ:- अगणित सूर्य, चन्द्रमा, शिव, ब्रह्मा, बहुत से पर्वत, नदियाँ, समुद्र, पृथ्वी, वन, काल, कर्म, गुण, ज्ञान और स्वभाव द

बालकांड दोहा 201

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चौपाई :एक बार जननीं अन्हवाए। करि सिंगार पलनाँ पौढ़ाए॥निज कुल इष्टदेव भगवाना। पूजा हेतु कीन्ह अस्नाना॥1॥भावार्थ:- एक बार माता ने श्री रामचन्द्रजी को स्नान कराया और श्रृंगार करके पालने पर पौढ़ा दिया। फिर अपने कुल के इष्टदेव भगवान की

बालकांड दोहा 200

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चौपाई :एहि बिधि राम जगत पितु माता। कोसलपुर बासिन्ह सुखदाता॥जिन्ह रघुनाथ चरन रति मानी। तिन्ह की यह गति प्रगट भवानी॥1॥भावार्थ:- इस प्रकार (सम्पूर्ण) जगत के माता-पिता श्री रामजी अवधपुर के निवासियों को सुख देते हैं, जिन्होंने श्री राम

बालकांड दोहा 199

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चौपाई :काम कोटि छबि स्याम सरीरा। नील कंज बारिद गंभीरा॥नअरुन चरन पंकज नख जोती। कमल दलन्हि बैठे जनु मोती॥1॥भावार्थ:- उनके नीलकमल और गंभीर (जल से भरे हुए) मेघ के समान श्याम शरीर में करोड़ों कामदेवों की शोभा है। लाल-लाल चरण कमलों के नखों 

बालकांड दोहा 198

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चौपाई :धरे नाम गुर हृदयँ बिचारी। बेद तत्व नृप तव सुत चारी॥मुनि धन जन सरबस सिव प्राना। बाल केलि रस तेहिं सुख माना॥1॥भावार्थ:- गुरुजी ने हृदय में विचार कर ये नाम रखे (और कहा-) हे राजन्‌! तुम्हारे चारों पुत्र वेद के तत्त्व (साक्षात्‌ परा

बालकांड दोहा 197

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चौपाई :कछुक दिवस बीते एहि भाँती। जात न जानिअ दिन अरु राती॥नामकरन कर अवसरु जानी। भूप बोलि पठए मुनि ग्यानी॥1॥भावार्थ:-इस प्रकार कुछ दिन बीत गए। दिन और रात जाते हुए जान नहीं पड़ते। तब नामकरण संस्कार का समय जानकर राजा ने ज्ञानी मुनि श्र

बालकांड दोहा 196

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चौपाई :यह रहस्य काहूँ नहिं जाना। दिनमनि चले करत गुनगाना॥देखि महोत्सव सुर मुनि नागा। चले भवन बरनत निज भागा॥1॥भावार्थ:- यह रहस्य किसी ने नहीं जाना। सूर्यदेव (भगवान श्री रामजी का) गुणगान करते हुए चले। यह महोत्सव देखकर देवता, मुनि और न