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बालकांड दोहा 235

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चौपाई :जानि कठिन सिवचाप बिसूरति। चली राखि उर स्यामल मूरति॥प्रभु जब जात जानकी जानी। सुख सनेह सोभा गुन खानी॥1॥भावार्थ:- शिवजी के धनुष को कठोर जानकर वे विसूरती (मन में विलाप करती) हुई हृदय में श्री रामजी की साँवली मूर्ति को रखकर चलीं। 

बालकांड दोहा 234

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चौपाई :धरि धीरजु एक आलि सयानी। सीता सन बोली गहि पानी॥बहुरि गौरि कर ध्यान करेहू। भूपकिसोर देखि किन लेहू॥1॥भावार्थ:- एक चतुर सखी धीरज धरकर, हाथ पकड़कर सीताजी से बोली- गिरिजाजी का ध्यान फिर कर लेना, इस समय राजकुमार को क्यों नहीं देख लेत

बालकांड दोहा 233

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चौपाई :सोभा सीवँ सुभग दोउ बीरा। नील पीत जलजाभ सरीरा॥मोरपंख सिर सोहत नीके। गुच्छ बीच बिच कुसुम कली के॥1॥भावार्थ:- दोनों सुंदर भाई शोभा की सीमा हैं। उनके शरीर की आभा नीले और पीले कमल की सी है। सिर पर सुंदर मोरपंख सुशोभित हैं। उनके बीच

बालकांड दोहा 232

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चौपाई :चितवति चकित चहूँ दिसि सीता। कहँ गए नृप किसोर मनु चिंता॥जहँ बिलोक मृग सावक नैनी। जनु तहँ बरिस कमल सित श्रेनी॥1॥भावार्थ:- सीताजी चकित होकर चारों ओर देख रही हैं। मन इस बात की चिन्ता कर रहा है कि राजकुमार कहाँ चले गए। बाल मृगनयनी

बालकांड दोहा 231

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चौपाई :तात जनकतनया यह सोई। धनुषजग्य जेहि कारन होई॥पूजन गौरि सखीं लै आईं। करत प्रकासु फिरइ फुलवाईं॥1॥भावार्थ:- हे तात! यह वही जनकजी की कन्या है, जिसके लिए धनुषयज्ञ हो रहा है। सखियाँ इसे गौरी पूजन के लिए ले आई हैं। यह फुलवाड़ी में प्रक

बालकांड दोहा 230

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चौपाई :कंकन किंकिनि नूपुर धुनि सुनि। कहत लखन सन रामु हृदयँ गुनि॥मानहुँ मदन दुंदुभी दीन्ही। मनसा बिस्व बिजय कहँ कीन्ही॥1॥भावार्थ:- कंकण (हाथों के कड़े), करधनी और पायजेब के शब्द सुनकर श्री रामचन्द्रजी हृदय में विचार कर लक्ष्मण से कहत

बालकांड दोहा 229

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चौपाई :देखन बागु कुअँर दुइ आए। बय किसोर सब भाँति सुहाए॥स्याम गौर किमि कहौं बखानी। गिरा अनयन नयन बिनु बानी॥1॥भावार्थ:- (उसने कहा-) दो राजकुमार बाग देखने आए हैं। किशोर अवस्था के हैं और सब प्रकार से सुंदर हैं। वे साँवले और गोरे (रंग के) ह

बालकांड दोहा 228

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चौपाई :चहुँ दिसि चितइ पूँछि मालीगन। लगे लेन दल फूल मुदित मन॥तेहि अवसर सीता तहँ आई। गिरिजा पूजन जननि पठाई॥1॥भावार्थ:- चारों ओर दृष्टि डालकर और मालियों से पूछकर वे प्रसन्न मन से पत्र-पुष्प लेने लगे। उसी समय सीताजी वहाँ आईं। माता ने उ