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बालकांड दोहा 219

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चौपाई :मुनि पद कमल बंदि दोउ भ्राता। चले लोक लोचन सुख दाता॥बालक बृंद देखि अति सोभा। लगे संग लोचन मनु लोभा॥1॥भावार्थ:- सब लोकों के नेत्रों को सुख देने वाले दोनों भाई मुनि के चरणकमलों की वंदना करके चले। बालकों के झुंड इन (के सौंदर्य) की 

बालकांड दोहा 218

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चौपाई :लखन हृदयँ लालसा बिसेषी। जाइ जनकपुर आइअ देखी॥प्रभु भय बहुरि मुनिहि सकुचाहीं। प्रगट न कहहिं मनहिं मुसुकाहीं॥1॥भावार्थ:- लक्ष्मणजी के हृदय में विशेष लालसा है कि जाकर जनकपुर देख आवें, परन्तु प्रभु श्री रामचन्द्रजी का डर है और

बालकांड दोहा 217

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चौपाई :मुनि तव चरन देखि कह राऊ। कहि न सकउँ निज पुन्य प्रभाऊ॥सुंदर स्याम गौर दोउ भ्राता। आनँदहू के आनँद दाता॥1॥भावार्थ:- राजा ने कहा- हे मुनि! आपके चरणों के दर्शन कर मैं अपना पुण्य प्रभाव कह नहीं सकता। ये सुंदर श्याम और गौर वर्ण के दोन

बालकांड दोहा 216

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चौपाई :कहहु नाथ सुंदर दोउ बालक। मुनिकुल तिलक कि नृपकुल पालक॥ब्रह्म जो निगम नेति कहि गावा। उभय बेष धरि की सोइ आवा॥1॥भावार्थ:- हे नाथ! कहिए, ये दोनों सुंदर बालक मुनिकुल के आभूषण हैं या किसी राजवंश के पालक? अथवा जिसका वेदों ने ‘नेति’ कह

बालकांड दोहा 215

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चौपाई :कीन्ह प्रनामु चरन धरि माथा। दीन्हि असीस मुदित मुनिनाथा॥बिप्रबृंद सब सादर बंदे। जानि भाग्य बड़ राउ अनंदे॥1॥भावार्थ:- राजा ने मुनि के चरणों पर मस्तक रखकर प्रणाम किया। मुनियों के स्वामी विश्वामित्रजी ने प्रसन्न होकर आशीर्वा

बालकांड दोहा 214

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चौपाई :सुभग द्वार सब कुलिस कपाटा। भूप भीर नट मागध भाटा॥बनी बिसाल बाजि गज साला। हय गय रख संकुल सब काला॥1॥भावार्थ:- राजमहल के सब दरवाजे (फाटक) सुंदर हैं, जिनमें वज्र के (मजबूत अथवा हीरों के चमकते हुए) किवाड़ लगे हैं। वहाँ (मातहत) राजाओं, न

बालकांड दोहा 213

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चौपाई :बनइ न बरनत नगर निकाई। जहाँ जाइ मन तहँइँ लोभाई॥चारु बजारु बिचित्र अँबारी। मनिमय बिधि जनु स्वकर सँवारी॥1॥भावार्थ:- नगर की सुंदरता का वर्णन करते नहीं बनता। मन जहाँ जाता है, वहीं लुभा जाता (रम जाता) है। सुंदर बाजार है, मणियों से ब

बालकांड दोहा 212

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चौपाई :चले राम लछिमन मुनि संगा। गए जहाँ जग पावनि गंगा॥गाधिसूनु सब कथा सुनाई। जेहि प्रकार सुरसरि महि आई॥1॥भावार्थ:- श्री रामजी और लक्ष्मणजी मुनि के साथ चले। वे वहाँ गए, जहाँ जगत को पवित्र करने वाली गंगाजी थीं। महाराज गाधि के पुत्र व