Home / Articles / Page / 87

बालकांड दोहा 211

Filed under: Balkand
छन्द :परसत पद पावन सोकनसावन प्रगट भई तपपुंज सही।देखत रघुनायक जन सुखदायक सनमुख होइ कर जोरि रही॥अति प्रेम अधीरा पुलक शरीरा मुख नहिं आवइ बचन कही।अतिसय बड़भागी चरनन्हि लागी जुगल नयन जलधार बही॥1॥भावार्थ:- श्री रामजी के पवित्र और शोक क

बालकांड दोहा 210

Filed under: Balkand
चौपाई :प्रात कहा मुनि सन रघुराई। निर्भय जग्य करहु तुम्ह जाई॥होम करन लागे मुनि झारी। आपु रहे मख कीं रखवारी॥1॥भावार्थ:- सबेरे श्री रघुनाथजी ने मुनि से कहा- आप जाकर निडर होकर यज्ञ कीजिए। यह सुनकर सब मुनि हवन करने लगे। आप (श्री रामजी) यज

बालकांड दोहा 209

Filed under: Balkand
चौपाई :अरुन नयन उर बाहु बिसाला। नील जलज तनु स्याम तमाला॥कटि पट पीत कसें बर भाथा। रुचिर चाप सायक दुहुँ हाथा॥1॥भावार्थ:- भगवान के लाल नेत्र हैं, चौड़ी छाती और विशाल भुजाएँ हैं, नील कमल और तमाल के वृक्ष की तरह श्याम शरीर है, कमर में पीताम

बालकांड दोहा 208

Filed under: Balkand
चौपाई :सुनि राजा अति अप्रिय बानी। हृदय कंप मुख दुति कुमुलानी॥चौथेंपन पायउँ सुत चारी। बिप्र बचन नहिं कहेहु बिचारी॥1॥भावार्थ:- इस अत्यन्त अप्रिय वाणी को सुनकर राजा का हृदय काँप उठा और उनके मुख की कांति फीकी पड़ गई। (उन्होंने कहा-) हे ब

बालकांड दोहा 207

Filed under: Balkand
चौपाई :मुनि आगमन सुना जब राजा। मिलन गयउ लै बिप्र समाजा॥करि दंडवत मुनिहि सनमानी। निज आसन बैठारेन्हि आनी॥1॥भावार्थ:- राजा ने जब मुनि का आना सुना, तब वे ब्राह्मणों के समाज को साथ लेकर मिलने गए और दण्डवत्‌ करके मुनि का सम्मान करते हुए उ

बालकांड दोहा 206

Filed under: Balkand
चौपाई :यह सब चरित कहा मैं गाई। आगिलि कथा सुनहु मन लाई॥बिस्वामित्र महामुनि ग्यानी। बसहिं बिपिन सुभ आश्रम जानी॥1॥भावार्थ:- यह सब चरित्र मैंने गाकर (बखानकर) कहा। अब आगे की कथा मन लगाकर सुनो। ज्ञानी महामुनि विश्वामित्रजी वन में शुभ आश

बालकांड दोहा 205

Filed under: Balkand
चौपाई :बंधु सखा सँग लेहिं बोलाई। बन मृगया नित खेलहिं जाई॥पावन मृग मारहिं जियँ जानी। दिन प्रति नृपहि देखावहिं आनी॥1॥भावार्थ:- श्री रामचन्द्रजी भाइयों और इष्ट मित्रों को बुलाकर साथ ले लेते हैं और नित्य वन में जाकर शिकार खेलते हैं। 

बालकांड दोहा 204

Filed under: Balkand
चौपाई :बालचरित अति सरल सुहाए। सारद सेष संभु श्रुति गाए॥जिन्ह कर मन इन्ह सन नहिं राता। ते जन बंचित किए बिधाता॥1॥भावार्थ:- श्री रामचन्द्रजी की बहुत ही सरल (भोली) और सुंदर (मनभावनी) बाललीलाओं का सरस्वती, शेषजी, शिवजी और वेदों ने गान किय