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बालकांड दोहा 195

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चौपाई :कैकयसुता सुमित्रा दोऊ। सुंदर सुत जनमत भैं ओऊ॥वह सुख संपति समय समाजा। कहि न सकइ सारद अहिराजा॥1॥भावार्थ:-कैकेयी और सुमित्रा- इन दोनों ने भी सुंदर पुत्रों को जन्म दिया। उस सुख, सम्पत्ति, समय और समाज का वर्णन सरस्वती और सर्पों क

बालकांड दोहा 194

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चौपाई :ध्वज पताक तोरन पुर छावा। कहि न जाइ जेहि भाँति बनावा॥सुमनबृष्टि अकास तें होई। ब्रह्मानंद मगन सब लोई॥1॥भावार्थ:- ध्वजा, पताका और तोरणों से नगर छा गया। जिस प्रकार से वह सजाया गया, उसका तो वर्णन ही नहीं हो सकता। आकाश से फूलों की व

बालकांड दोहा 193

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चौपाई :सुनि सिसु रुदन परम प्रिय बानी। संभ्रम चलि आईं सब रानी॥हरषित जहँ तहँ धाईं दासी। आनँद मगन सकल पुरबासी॥1॥भावार्थ:-बच्चे के रोने की बहुत ही प्यारी ध्वनि सुनकर सब रानियाँ उतावली होकर दौड़ी चली आईं। दासियाँ हर्षित होकर जहाँ-तहाँ 

बालकांड दोहा 192

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छन्द :भए प्रगट कृपाला दीनदयाला कौसल्या हितकारी।हरषित महतारी मुनि मन हारी अद्भुत रूप बिचारी॥लोचन अभिरामा तनु घनस्यामा निज आयुध भुजचारी।भूषन बनमाला नयन बिसाला सोभासिंधु खरारी॥1॥भावार्थ:- दीनों पर दया करने वाले, कौसल्याजी के हि

बालकांड दोहा 191

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चौपाई :नौमी तिथि मधु मास पुनीता। सुकल पच्छ अभिजित हरिप्रीता॥मध्यदिवस अति सीत न घामा। पावन काल लोक बिश्रामा॥1॥भावार्थ:- पवित्र चैत्र का महीना था, नवमी तिथि थी। शुक्ल पक्ष और भगवान का प्रिय अभिजित्‌ मुहूर्त था। दोपहर का समय था। न बह

बालकांड दोहा 190

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चौपाई :तबहिं रायँ प्रिय नारि बोलाईं। कौसल्यादि तहाँ चलि आईं॥अर्ध भाग कौसल्यहि दीन्हा। उभय भाग आधे कर कीन्हा॥1॥भावार्थ:- उसी समय राजा ने अपनी प्यारी पत्नियों को बुलाया। कौसल्या आदि सब (रानियाँ) वहाँ चली आईं। राजा ने (पायस का) आधा भा

बालकांड दोहा 189

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चौपाई :एक बार भूपति मन माहीं। भै गलानि मोरें सुत नाहीं॥गुर गृह गयउ तुरत महिपाला। चरन लागि करि बिनय बिसाला॥1॥भावार्थ:- एक बार राजा के मन में बड़ी ग्लानि हुई कि मेरे पुत्र नहीं है। राजा तुरंत ही गुरु के घर गए और चरणों में प्रणाम कर बहुत 

बालकांड दोहा 188

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चौपाई :गए देव सब निज निज धामा। भूमि सहित मन कहुँ बिश्रामा॥जो कछु आयसु ब्रह्माँ दीन्हा। हरषे देव बिलंब न कीन्हा॥1॥भावार्थ:- सब देवता अपने-अपने लोक को गए। पृथ्वी सहित सबके मन को शांति मिली। ब्रह्माजी ने जो कुछ आज्ञा दी, उससे देवता बहु