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बालकांड दोहा 291

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चौपाई :सुनि पाती पुलके दोउ भ्राता। अधिन सनेहु समात न गाता॥प्रीति पुनीत भरत कै देखी। सकल सभाँ सुखु लहेउ बिसेषी॥1॥ भावार्थ:- चिट्ठी सुनकर दोनों भाई पुलकित हो गए। स्नेह इतना अधिक हो गया कि वह शरीर में समाता नहीं। भरतजी का पवित्र प्र

बालकांड दोहा 290

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चौपाई :पहुँचे दूत राम पुर पावन। हरषे नगर बिलोकि सुहावन॥भूप द्वार तिन्ह खबरि जनाई। दसरथ नृप सुनि लिए बोलाई॥1॥ भावार्थ:- जनकजी के दूत श्री रामचन्द्रजी की पवित्र पुरी अयोध्या में पहुँचे। सुंदर नगर देखकर वे हर्षित हुए। राजद्वार पर 

बालकांड दोहा 289

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चौपाई :रचे रुचिर बर बंदनिवारे। मनहुँ मनोभवँ फंद सँवारे॥मंगल कलश अनेक बनाए। ध्वज पताक पट चमर सुहाए॥1॥ भावार्थ:- ऐसे सुंदर और उत्तम बंदनवार बनाए मानो कामदेव ने फंदे सजाए हों। अनेकों मंगल कलश और सुंदर ध्वजा, पताका, परदे और चँवर बनाए

बालकांड दोहा 288

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चौपाई :बेनु हरित मनिमय सब कीन्हे। सरल सपरब परहिं नहिं चीन्हे॥कनक कलित अहिबेलि बनाई। लखि नहिं परइ सपरन सुहाई॥1॥ भावार्थ:- बाँस सब हरी-हरी मणियों (पन्ने) के सीधे और गाँठों से युक्त ऐसे बनाए जो पहचाने नहीं जाते थे (कि मणियों के हैं या 

बालकांड दोहा 287

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चौपाई :दूत अवधपुर पठवहु जाई। आनहिं नृप दसरथहिं बोलाई॥मुदित राउ कहि भलेहिं कृपाला। पठए दूत बोलि तेहि काला॥1॥ भावार्थ:- जाकर अयोध्या को दूत भेजो, जो राजा दशरथ को बुला लावें। राजा ने प्रसन्न होकर कहा- हे कृपालु! बहुत अच्छा! और उसी समय

बालकांड दोहा 286

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चौपाई :अति गहगहे बाजने बाजे। सबहिं मनोहर मंगल साजे॥जूथ जूथ मिलि सुमुखि सुनयनीं। करहिं गान कल कोकिलबयनीं॥1॥ भावार्थ:- खूब जोर से बाजे बजने लगे। सभी ने मनोहर मंगल साज साजे। सुंदर मुख और सुंदर नेत्रों वाली तथा कोयल के समान मधुर बोल

बालकांड दोहा 285

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चौपाई :जय रघुबंस बनज बन भानू। गहन दनुज कुल दहन कृसानू॥जय सुर बिप्र धेनु हितकारी। जय मद मोह कोह भ्रम हारी॥1॥ भावार्थ:- हे रघुकुल रूपी कमल वन के सूर्य! हे राक्षसों के कुल रूपी घने जंगल को जलाने वाले अग्नि! आपकी जय हो! हे देवता, ब्राह्म

बालकांड दोहा 284

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चौपाई :देव दनुज भूपति भट नाना। समबल अधिक होउ बलवाना॥जौं रन हमहि पचारै कोऊ। लरहिं सुखेन कालु किन होऊ ॥1॥ भावार्थ:- देवता, दैत्य, राजा या और बहुत से योद्धा, वे चाहे बल में हमारे बराबर हों चाहे अधिक बलवान हों, यदि रण में हमें कोई भी ललका