बालकांड दोहा 291
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चौपाई :सुनि पाती पुलके दोउ भ्राता। अधिन सनेहु समात न गाता॥प्रीति पुनीत भरत कै देखी। सकल सभाँ सुखु लहेउ बिसेषी॥1॥ भावार्थ:- चिट्ठी सुनकर दोनों भाई पुलकित हो गए। स्नेह इतना अधिक हो गया कि वह शरीर में समाता नहीं। भरतजी का पवित्र प्र