बालकांड दोहा 283
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चौपाई:निपटहिं द्विज करि जानहि मोही। मैं जस बिप्र सुनावउँ तोही॥चाप सुवा सर आहुति जानू। कोपु मोर अति घोर कृसानू॥1॥ भावार्थ:- तू मुझे निरा ब्राह्मण ही समझता है? मैं जैसा विप्र हूँ, तुझे सुनाता हूँ। धनुष को सु्रवा, बाण को आहुति और मेर