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बालकांड दोहा 283

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चौपाई:निपटहिं द्विज करि जानहि मोही। मैं जस बिप्र सुनावउँ तोही॥चाप सुवा सर आहुति जानू। कोपु मोर अति घोर कृसानू॥1॥ भावार्थ:- तू मुझे निरा ब्राह्मण ही समझता है? मैं जैसा विप्र हूँ, तुझे सुनाता हूँ। धनुष को सु्रवा, बाण को आहुति और मेर

बालकांड दोहा 282

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चौपाई :देखि कुठार बान धनु धारी। भै लरिकहि रिस बीरु बिचारी॥नामु जान पै तुम्हहि न चीन्हा। बंस सुभायँ उतरु तेहिं दीन्हा॥1॥ भावार्थ:- आपको कुठार, बाण और धनुष धारण किए देखकर और वीर समझकर बालक को क्रोध आ गया। वह आपका नाम तो जानता था, पर उ

बालकांड दोहा 281

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चौपाई :बंधु कहइ कटु संमत तोरें। तू छल बिनय करसि कर जोरें॥करु परितोषु मोर संग्रामा। नाहिं त छाड़ कहाउब रामा॥1॥ भावार्थ:- तेरा यह भाई तेरी ही सम्मति से कटु वचन बोलता है और तू छल से हाथ जोड़कर विनय करता है। या तो युद्ध में मेरा संतोष कर, 

बालकांड दोहा 280

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चौपाई :बहइ न हाथु दहइ रिस छाती। भा कुठारु कुंठित नृपघाती॥भयउ बाम बिधि फिरेउ सुभाऊ। मोरे हृदयँ कृपा कसि काऊ॥1॥ भावार्थ:- हाथ चलता नहीं, क्रोध से छाती जली जाती है। (हाय!) राजाओं का घातक यह कुठार भी कुण्ठित हो गया। विधाता विपरीत हो गया,

बालकांड दोहा 279

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चौपाई :अति बिनीत मृदु सीतल बानी। बोले रामु जोरि जुग पानी॥सुनहु नाथ तुम्ह सहज सुजाना। बालक बचनु करिअ नहिं काना॥1॥ भावार्थ:- श्री रामचन्द्रजी दोनों हाथ जोड़कर अत्यन्त विनय के साथ कोमल और शीतल वाणी बोले- हे नाथ! सुनिए, आप तो स्वभाव से 

बालकांड दोहा 278

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चौपाई :मैं तुम्हार अनुचर मुनिराया। परिहरि कोपु करिअ अब दाया॥टूट चाप नहिं जुरिहि रिसाने। बैठिअ होइहिं पाय पिराने॥1॥ भावार्थ:- हे मुनिराज! मैं आपका दास हूँ। अब क्रोध त्यागकर दया कीजिए। टूटा हुआ धनुष क्रोध करने से जुड़ नहीं जाएगा। 

बालकांड दोहा 277

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चौपाई :नाथ करहु बालक पर छोहु। सूध दूधमुख करिअ न कोहू॥जौं पै प्रभु प्रभाउ कछु जाना। तौ कि बराबरि करत अयाना॥1॥ भावार्थ:- हे नाथ ! बालक पर कृपा कीजिए। इस सीधे और दूधमुँहे बच्चे पर क्रोध न कीजिए। यदि यह प्रभु का (आपका) कुछ भी प्रभाव जानत

बालकांड दोहा 276

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चौपाई :कहेउ लखन मुनि सीलु तुम्हारा। को नहिं जान बिदित संसारा॥माता पितहि उरिन भए नीकें। गुर रिनु रहा सोचु बड़ जीकें॥1॥ भावार्थ:- लक्ष्मणजी ने कहा- हे मुनि! आपके शील को कौन नहीं जानता? वह संसार भर में प्रसिद्ध है। आप माता-पिता से तो