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बालकांड दोहा 267

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चौपाई :बैनतेय बलि जिमि चह कागू। जिमि ससु चहै नाग अरि भागू॥जिमि चह कुसल अकारन कोही। सब संपदा चहै सिवद्रोही॥1॥ भावार्थ:- जैसे गरुड़ का भाग कौआ चाहे, सिंह का भाग खरगोश चाहे, बिना कारण ही क्रोध करने वाला अपनी कुशल चाहे, शिवजी से विरोध करन

बालकांड दोहा 266

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चौपाई :तब सिय देखि भूप अभिलाषे। कूर कपूत मूढ़ मन माखे॥उठि उठि पहिरि सनाह अभागे। जहँ तहँ गाल बजावन लागे॥1॥ भावार्थ:- उस समय सीताजी को देखकर कुछ राजा लोग ललचा उठे। वे दुष्ट, कुपूत और मूढ़ राजा मन में बहुत तमतमाए। वे अभागे उठ-उठकर, कवच पहन

बालकांड दोहा 265

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चौपाई :पुर अरु ब्योम बाजने बाजे। खल भए मलिन साधु सब राजे॥सुर किंनर नर नाग मुनीसा। जय जय जय कहि देहिं असीसा॥1॥ भावार्थ:- नगर और आकाश में बाजे बजने लगे। दुष्ट लोग उदास हो गए और सज्जन लोग सब प्रसन्न हो गए। देवता, किन्नर, मनुष्य, नाग और मु

बालकांड दोहा 264

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चौपाई :सखिन्ह मध्य सिय सोहति कैसें। छबिगन मध्य महाछबि जैसें॥कर सरोज जयमाल सुहाई। बिस्व बिजय सोभा जेहिं छाई॥1॥ भावार्थ:- सखियों के बीच में सीताजी कैसी शोभित हो रही हैं, जैसे बहुत सी छवियों के बीच में महाछवि हो। करकमल में सुंदर जयमा

बालकांड दोहा 263

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चौपाई :झाँझि मृदंग संख सहनाई। भेरि ढोल दुंदुभी सुहाई॥बाजहिं बहु बाजने सुहाए। जहँ तहँ जुबतिन्ह मंगल गाए॥1॥ भावार्थ:- झाँझ, मृदंग, शंख, शहनाई, भेरी, ढोल और सुहावने नगाड़े आदि बहुत प्रकार के सुंदर बाजे बज रहे हैं। जहाँ-तहाँ युवतियाँ मं

बालकांड दोहा 262

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चौपाई :प्रभु दोउ चापखंड महि डारे। देखि लोग सब भए सुखारे॥कौसिकरूप पयोनिधि पावन। प्रेम बारि अवगाहु सुहावन॥1॥ भावार्थ:- प्रभु ने धनुष के दोनों टुकड़े पृथ्वी पर डाल दिए। यह देखकर सब लोग सुखी हुए। विश्वामित्र रूपी पवित्र समुद्र में, जि

बालकांड दोहा 261

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चौपाई :देखी बिपुल बिकल बैदेही। निमिष बिहात कलप सम तेही।तृषित बारि बिनु जो तनु त्यागा। मुएँ करइ का सुधा तड़ागा॥1॥ भावार्थ:- उन्होंने जानकीजी को बहुत ही विकल देखा। उनका एक-एक क्षण कल्प के समान बीत रहा था। यदि प्यासा आदमी पानी के बिना 

बालकांड दोहा 260

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चौपाई :दिसिकुंजरहु कमठ अहि कोला। धरहु धरनि धरि धीर न डोला॥रामु चहहिं संकर धनु तोरा। होहु सजग सुनि आयसु मोरा॥1॥ भावार्थ:- हे दिग्गजो! हे कच्छप! हे शेष! हे वाराह! धीरज धरकर पृथ्वी को थामे रहो, जिससे यह हिलने न पावे। श्री रामचन्द्रजी शि