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बालकांड दोहा 275

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चौपाई :तुम्ह तौ कालु हाँक जनु लावा। बार बार मोहि लागि बोलावा॥सुनत लखन के बचन कठोरा। परसु सुधारि धरेउ कर घोरा॥1॥ भावार्थ:- आप तो मानो काल को हाँक लगाकर बार-बार उसे मेरे लिए बुलाते हैं। लक्ष्मणजी के कठोर वचन सुनते ही परशुरामजी ने अप

बालकांड दोहा 274

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चौपाई :कौसिक सुनहु मंद यहु बालकु। कुटिल कालबस निज कुल घालकु॥भानु बंस राकेस कलंकू। निपट निरंकुस अबुध असंकू॥1॥ भावार्थ:- हे विश्वामित्र! सुनो, यह बालक बड़ा कुबुद्धि और कुटिल है, काल के वश होकर यह अपने कुल का घातक बन रहा है। यह सूर्यवं

बालकांड दोहा 273

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चौपाई :बिहसि लखनु बोले मृदु बानी। अहो मुनीसु महा भटमानी॥पुनि पुनि मोहि देखाव कुठारू। चहत उड़ावन फूँकि पहारू॥1॥ भावार्थ:- लक्ष्मणजी हँसकर कोमल वाणी से बोले- अहो, मुनीश्वर तो अपने को बड़ा भारी योद्धा समझते हैं। बार-बार मुझे कुल्हाड़

बालकांड दोहा 272

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चौपाई :लखन कहा हँसि हमरें जाना। सुनहु देव सब धनुष समाना॥का छति लाभु जून धनु तोरें। देखा राम नयन के भोरें॥1॥ भावार्थ:- लक्ष्मणजी ने हँसकर कहा- हे देव! सुनिए, हमारे जान में तो सभी धनुष एक से ही हैं। पुराने धनुष के तोड़ने में क्या हानि-ल

बालकांड दोहा 271

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चौपाई :नाथ संभुधनु भंजनिहारा। होइहि केउ एक दास तुम्हारा॥आयसु काह कहिअ किन मोही। सुनि रिसाइ बोले मुनि कोही॥1॥ भावार्थ:- हे नाथ! शिवजी के धनुष को तोड़ने वाला आपका कोई एक दास ही होगा। क्या आज्ञा है, मुझसे क्यों नहीं कहते? यह सुनकर क्रोध

बालकांड दोहा 270

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चौपाई :समाचार कहि जनक सुनाए। जेहि कारन महीप सब आए॥सुनत बचन फिरि अनत निहारे। देखे चापखंड महि डारे॥1॥ भावार्थ:- जिस कारण सब राजा आए थे, राजा जनक ने वे सब समाचार कह सुनाए। जनक के वचन सुनकर परशुरामजी ने फिरकर दूसरी ओर देखा तो धनुष के टुक

बालकांड दोहा 269

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चौपाई :देखत भृगुपति बेषु कराला। उठे सकल भय बिकल भुआला॥पितु समेत कहि कहि निज नामा। लगे करन सब दंड प्रनामा॥1॥ भावार्थ:- परशुरामजी का भयानक वेष देखकर सब राजा भय से व्याकुल हो उठ खड़े हुए और पिता सहित अपना नाम कह-कहकर सब दंडवत प्रणाम करन

बालकांड दोहा 268

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चौपाई :खरभरु देखि बिकल पुर नारीं। सब मिलि देहिं महीपन्ह गारीं॥तेहिं अवसर सुनि सिवधनु भंगा। आयउ भृगुकुल कमल पतंगा॥1॥ भावार्थ:- खलबली देखकर जनकपुरी की स्त्रियाँ व्याकुल हो गईं और सब मिलकर राजाओं को गालियाँ देने लगीं। उसी मौके पर श