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बालकांड दोहा 299

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चौपाई :बाँधें बिरद बीर रन गाढ़े। निकसि भए पुर बाहेर ठाढ़े॥फेरहिं चतुर तुरग गति नाना। हरषहिं सुनि सुनि पनव निसाना॥1॥ भावार्थ:- शूरता का बाना धारण किए हुए रणधीर वीर सब निकलकर नगर के बाहर आ खड़े हुए। वे चतुर अपने घोड़ों को तरह-तरह की चालो

बालकांड दोहा 298

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चौपाई :भूप भरत पुनि लिए बोलाई। हय गयस्यंदन साजहु जाई॥चलहु बेगि रघुबीर बराता। सुनत पुलक पूरे दोउ भ्राता॥1॥ भावार्थ:- फिर राजा ने भरतजी को बुला लिया और कहा कि जाकर घोड़े, हाथी और रथ सजाओ, जल्दी रामचन्द्रजी की बारात में चलो। यह सुनते ह

बालकांड दोहा 297

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चौपाई :जहँ तहँ जूथ जूथ मिलि भामिनि। सजि नव सप्त सकल दुति दामिनि॥बिधुबदनीं मृग सावक लोचनि। निज सरूप रति मानु बिमोचनि॥1॥ भावार्थ:- बिजली की सी कांति वाली चन्द्रमुखी, हरिन के बच्चे के से नेत्र वाली और अपने सुंदर रूप से कामदेव की स्त

बालकांड दोहा 296

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चौपाई :कहत चले पहिरें पट नाना। हरषि हने गहगहे निसाना॥समाचार सब लोगन्ह पाए। लागे घर-घर होन बधाए॥1॥ भावार्थ:- यों कहते हुए वे अनेक प्रकार के सुंदर वस्त्र पहन-पहनकर चले। आनंदित होकर नगाड़े वालों ने बड़े जोर से नगाड़ों पर चोट लगाई। सब लो

बालकांड दोहा 295

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चौपाई :राजा सबु रनिवास बोलाई। जनक पत्रिका बाचि सुनाई॥सुनि संदेसु सकल हरषानीं। अपर कथा सब भूप बखानीं॥1॥ भावार्थ:- राजा ने सारे रनिवास को बुलाकर जनकजी की पत्रिका बाँचकर सुनाई। समाचार सुनकर सब रानियाँ हर्ष से भर गईं। राजा ने फिर द

बालकांड दोहा 294

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चौपाई :सुनि बोले गुर अति सुखु पाई। पुन्य पुरुष कहुँ महि सुख छाई॥जिमि सरिता सागर महुँ जाहीं। जद्यपि ताहि कामना नाहीं॥1॥ भावार्थ:- सब समाचार सुनकर और अत्यन्त सुख पाकर गुरु बोले- पुण्यात्मा पुरुष के लिए पृथ्वी सुखों से छाई हुई है। ज

बालकांड दोहा 293

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चौपाई :सुनि सरोष भृगुनायकु आए। बहुत भाँति तिन्ह आँखि देखाए॥देखि राम बलु निज धनु दीन्हा। करिबहु बिनय गवनु बन कीन्हा॥1॥ भावार्थ:- धनुष टूटने की बात सुनकर परशुरामजी क्रोध में भरे आए और उन्होंने बहुत प्रकार से आँखें दिखलाईं। अंत मे

बालकांड दोहा 292

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चौपाई :पूछन जोगु न तनय तुम्हारे। पुरुषसिंघ तिहु पुर उजिआरे॥जिन्ह के जस प्रताप कें आगे। ससि मलीन रबि सीतल लागे॥1॥ भावार्थ:- आपके पुत्र पूछने योग्य नहीं हैं। वे पुरुषसिंह तीनों लोकों के प्रकाश स्वरूप हैं। जिनके यश के आगे चन्द्रमा