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बालकांड दोहा 259

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चौपाई :गिरा अलिनि मुख पंकज रोकी। प्रगट न लाज निसा अवलोकी॥लोचन जलु रह लोचन कोना। जैसें परम कृपन कर सोना॥1॥ भावार्थ:- सीताजी की वाणी रूपी भ्रमरी को उनके मुख रूपी कमल ने रोक रखा है। लाज रूपी रात्रि को देखकर वह प्रकट नहीं हो रही है। नेत्

बालकांड दोहा 258

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चौपाई :नीकें निरखि नयन भरि सोभा। पितु पनु सुमिरि बहुरि मनु छोभा॥अहह तात दारुनि हठ ठानी। समुझत नहिं कछु लाभु न हानी॥1॥ भावार्थ:- अच्छी तरह नेत्र भरकर श्री रामजी की शोभा देखकर, फिर पिता के प्रण का स्मरण करके सीताजी का मन क्षुब्ध हो उठ

बालकांड दोहा 257

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चौपाई :काम कुसुम धनु सायक लीन्हे। सकल भुवन अपनें बस कीन्हे॥देबि तजिअ संसउ अस जानी। भंजब धनुषु राम सुनु रानी॥1॥भावार्थ:- कामदेव ने फूलों का ही धनुष-बाण लेकर समस्त लोकों को अपने वश में कर रखा है। हे देवी! ऐसा जानकर संदेह त्याग दीजिए। 

बालकांड दोहा 256

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चौपाई :सखि सब कौतुक देख निहारे। जेउ कहावत हितू हमारे॥कोउ न बुझाइ कहइ गुर पाहीं। ए बालक असि हठ भलि नाहीं॥1॥भावार्थ:- हे सखी! ये जो हमारे हितू कहलाते हैं, वे भी सब तमाशा देखने वाले हैं। कोई भी (इनके) गुरु विश्वामित्रजी को समझाकर नहीं कह

बालकांड दोहा 255

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चौपाई :नृपन्ह केरि आसा निसि नासी। बचन नखत अवली न प्रकासी॥मानी महिप कुमुद सकुचाने। कपटी भूप उलूक लुकाने॥1॥भावार्थ:- राजाओं की आशा रूपी रात्रि नष्ट हो गई। उनके वचन रूपी तारों के समूह का चमकना बंद हो गया। (वे मौन हो गए)। अभिमानी राजा र

बालकांड दोहा 254

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चौपाई :लखन सकोप बचन जे बोले। डगमगानि महि दिग्गज डोले॥सकल लोग सब भूप डेराने। सिय हियँ हरषु जनकु सकुचाने॥1॥भावार्थ:- ज्यों ही लक्ष्मणजी क्रोध भरे वचन बोले कि पृथ्वी डगमगा उठी और दिशाओं के हाथी काँप गए। सभी लोग और सब राजा डर गए। सीताज

बालकांड दोहा 253

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चौपाई :रघुबंसिन्ह महुँ जहँ कोउ होई। तेहिं समाज अस कहइ न कोई॥कही जनक जसि अनुचित बानी। बिद्यमान रघुकुल मनि जानी॥1॥भावार्थ:- रघुवंशियों में कोई भी जहाँ होता है, उस समाज में ऐसे वचन कोई नहीं कहता, जैसे अनुचित वचन रघुकुल शिरोमणि श्री रा

बालकांड दोहा 252

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चौपाई :कहहु काहि यहु लाभु न भावा। काहुँ न संकर चाप चढ़ावा॥रहउ चढ़ाउब तोरब भाई। तिलु भरि भूमि न सके छड़ाई॥1॥भावार्थ:- कहिए, यह लाभ किसको अच्छा नहीं लगता, परन्तु किसी ने भी शंकरजी का धनुष नहीं चढ़ाया। अरे भाई! चढ़ाना और तोड़ना तो दूर रहा, कोई त