बालकांड दोहा 259
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चौपाई :गिरा अलिनि मुख पंकज रोकी। प्रगट न लाज निसा अवलोकी॥लोचन जलु रह लोचन कोना। जैसें परम कृपन कर सोना॥1॥ भावार्थ:- सीताजी की वाणी रूपी भ्रमरी को उनके मुख रूपी कमल ने रोक रखा है। लाज रूपी रात्रि को देखकर वह प्रकट नहीं हो रही है। नेत्