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बालकांड दोहा 315

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चौपाई :जिन्ह कर नामु लेत जग माहीं। सकल अमंगल मूल नसाहीं॥करतल होहिं पदारथ चारी। तेइ सिय रामु कहेउ कामारी॥1॥ भावार्थ:- जिनका नाम लेते ही जगत में सारे अमंगलों की जड़ कट जाती है और चारों पदार्थ (अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष) मुट्ठी में आ जाते ह

बालकांड दोहा 314

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चौपाई :सुरन्ह सुमंगल अवसरु जाना। बरषहिं सुमन बजाइ निसाना॥सिव ब्रह्मादिक बिबुध बरूथा। चढ़े बिमानन्हि नाना जूथा॥1॥ भावार्थ:- देवगण सुंदर मंगल का अवसर जानकर, नगाड़े बजा-बजाकर फूल बरसाते हैं। शिवजी, ब्रह्माजी आदि देववृन्द यूथ (टोलि

बालकांड दोहा 313

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चौपाई :उपरोहितहि कहेउ नरनाहा। अब बिलंब कर कारनु काहा॥सतानंद तब सचिव बोलाए। मंगल सकल साजि सब ल्याए॥1॥ भावार्थ:- तब राजा जनक ने पुरोहित शतानंदजी से कहा कि अब देरी का क्या कारण है। तब शतानंदजी ने मंत्रियों को बुलाया। वे सब मंगल का स

बालकांड दोहा 312

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चौपाई :एहि बिधि सकल मनोरथ करहीं। आनँद उमगि उमगि उर भरहीं॥जे नृप सीय स्वयंबर आए। देखि बंधु सब तिन्ह सुख पाए॥1॥ भावार्थ:- इस प्रकार सब मनोरथ कर रही हैं और हृदय को उमंग-उमंगकर (उत्साहपूर्वक) आनंद से भर रही हैं। सीताजी के स्वयंवर में ज

बालकांड दोहा 311

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चौपाई :बिबिध भाँति होइहि पहुनाई। प्रिय न काहि अस सासुर माई॥तब तब राम लखनहि निहारी। होइहहिं सब पुर लोग सुखारी॥1॥ भावार्थ:- तब उनकी अनेकों प्रकार से पहुनाई होगी। सखी! ऐसी ससुराल किसे प्यारी न होगी! तब-तब हम सब नगर निवासी श्री राम-लक्

बालकांड दोहा 310

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चौपाई :जनक सुकृत मूरति बैदेही। दसरथ सुकृत रामु धरें देही॥इन्ह सम काहुँ न सिव अवराधे। काहुँ न इन्ह समान फल लाधे॥1॥ भावार्थ:- जनकजी के सुकृत (पुण्य) की मूर्ति जानकीजी हैं और दशरथजी के सुकृत देह धारण किए हुए श्री रामजी हैं। इन (दोनों 

बालकांड दोहा 309

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चौपाई :रामहि देखि बरात जुड़ानी। प्रीति कि रीति न जाति बखानी॥नृप समीप सोहहिं सुत चारी। जनु धन धरमादिक तनुधारी॥1॥ भावार्थ:- श्री रामचन्द्रजी को देखकर बारात शीतल हुई (राम के वियोग में सबके हृदय में जो आग जल रही थी, वह शांत हो गई)। प्र

बालकांड दोहा 308

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चौपाई :मुनिहि दंडवत कीन्ह महीसा। बार बार पद रज धरि सीसा॥कौसिक राउ लिए उर लाई। कहि असीस पूछी कुसलाई॥1॥ भावार्थ:- पृथ्वीपति दशरथजी ने मुनि की चरणधूलि को बारंबार सिर पर चढ़ाकर उनको दण्डवत्‌ प्रणाम किया। विश्वामित्रजी ने राजा को उठा