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बालकांड दोहा 307

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चौपाई :निज निज बास बिलोकि बराती। सुर सुख सकल सुलभ सब भाँती॥बिभव भेद कछु कोउ न जाना। सकल जनक कर करहिं बखाना॥1॥ भावार्थ:- बारातियों ने अपने-अपने ठहरने के स्थान देखे तो वहाँ देवताओं के सब सुखों को सब प्रकार से सुलभ पाया। इस ऐश्वर्य का

बालकांड दोहा 306

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चौपाई :बरषि सुमन सुर सुंदरि गावहिं। मुदित देव दुंदुभीं बजावहिं॥बस्तु सकल राखीं नृप आगें। बिनय कीन्हि तिन्ह अति अनुरागें॥1॥ भावार्थ:- देवसुंदरियाँ फूल बरसाकर गीत गा रही हैं और देवता आनंदित होकर नगाड़े बजा रहे हैं। (अगवानी में आए 

बालकांड दोहा 305

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चौपाई :कनक कलस भरि कोपर थारा। भाजन ललित अनेक प्रकारा॥भरे सुधा सम सब पकवाने। नाना भाँति न जाहिं बखाने॥1॥ भावार्थ:- (दूध, शर्बत, ठंडाई, जल आदि से) भरकर सोने के कलश तथा जिनका वर्णन नहीं हो सकता ऐसे अमृत के समान भाँति-भाँति के सब पकवानों 

बालकांड दोहा 304

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चौपाई :मंगल सगुन सुगम सब ताकें। सगुन ब्रह्म सुंदर सुत जाकें॥राम सरिस बरु दुलहिनि सीता। समधी दसरथु जनकु पुनीता॥1॥ भावार्थ:-स्वयं सगुण ब्रह्म जिसके सुंदर पुत्र हैं, उसके लिए सब मंगल शकुन सुलभ हैं। जहाँ श्री रामचन्द्रजी सरीखे दूल

बालकांड दोहा 303

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चौपाई :बनइ न बरनत बनी बराता। होहिं सगुन सुंदर सुभदाता॥चारा चाषु बाम दिसि लेई। मनहुँ सकल मंगल कहि देई॥1॥ भावार्थ:- बारात ऐसी बनी है कि उसका वर्णन करते नहीं बनता। सुंदर शुभदायक शकुन हो रहे हैं। नीलकंठ पक्षी बाईं ओर चारा ले रहा है, मा

बालकांड दोहा 302

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चौपाई :सहित बसिष्ठ सोह नृप कैसें। सुर गुर संग पुरंदर जैसें॥करि कुल रीति बेद बिधि राऊ। देखि सबहि सब भाँति बनाऊ॥1॥ भावार्थ:- वशिष्ठजी के साथ (जाते हुए) राजा दशरथजी कैसे शोभित हो रहे हैं, जैसे देव गुरु बृहस्पतिजी के साथ इन्द्र हों। वे

बालकांड दोहा 301

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चौपाई :गरजहिं गज घंटा धुनि घोरा। रथ रव बाजि हिंस चहु ओरा॥निदरि घनहि घुर्म्मरहिं निसाना। निज पराइ कछु सुनिअ न काना॥1॥ भावार्थ:- हाथी गरज रहे हैं, उनके घंटों की भीषण ध्वनि हो रही है। चारों ओर रथों की घरघराहट और घोड़ों की हिनहिनाहट हो 

बालकांड दोहा 300

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चौपाई :कलित करिबरन्हि परीं अँबारीं। कहि न जाहिं जेहि भाँति सँवारीं॥चले मत्त गज घंट बिराजी। मनहुँ सुभग सावन घन राजी॥1। भावार्थ:- श्रेष्ठ हाथियों पर सुंदर अंबारियाँ पड़ी हैं। वे जिस प्रकार सजाई गई थीं, सो कहा नहीं जा सकता। मतवाले ह