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अयोध्याकाण्ड दोहा 113

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चौपाई :जे पुर गाँव बसहिं मग माहीं। तिन्हहि नाग सुर नगर सिहाहीं॥केहि सुकृतीं केहि घरीं बसाए। धन्य पुन्यमय परम सुहाए॥1॥ भावार्थ:- जो गाँव और पुरवे रास्ते में बसे हैं, नागों और देवताओं के नगर उनको देखकर प्रशंसा पूर्वक ईर्षा करते और 

अयोध्याकाण्ड दोहा 112

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चौपाई :पुनि सियँ राम लखन कर जोरी। जमुनहि कीन्ह प्रनामु बहोरी॥चले ससीय मुदित दोउ भाई। रबितनुजा कइ करत बड़ाई॥1॥ भावार्थ:- फिर सीताजी, श्री रामजी और लक्ष्मणजी ने हाथ जोड़कर यमुनाजी को पुनः प्रणाम किया और सूर्यकन्या यमुनाजी की बड़ाई क

अयोध्याकाण्ड दोहा 111

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चौपाई :राम सप्रेम पुलकि उर लावा। परम रंक जनु पारसु पावा॥मनहुँ प्रेमु परमारथु दोऊ। मिलत धरें तन कह सबु कोऊ॥1॥ भावार्थ:- श्री रामजी ने प्रेमपूर्वक पुलकित होकर उसको हृदय से लगा लिया। (उसे इतना आनंद हुआ) मानो कोई महादरिद्री मनुष्य पा

अयोध्याकाण्ड दोहा 110

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चौपाई :सुनत तीरबासी नर नारी। धाए निज निज काज बिसारी॥लखन राम सिय सुंदरताई। देखि करहिं निज भाग्य बड़ाई॥1॥ भावार्थ:- यमुनाजी के किनारे पर रहने वाले स्त्री-पुरुष (यह सुनकर कि निषाद के साथ दो परम सुंदर सुकुमार नवयुवक और एक परम सुंदरी स

अयोध्याकाण्ड दोहा 109

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चौपाई :राम सप्रेम कहेउ मुनि पाहीं। नाथ कहिअ हम केहि मग जाहीं॥मुनि मन बिहसि राम सन कहहीं। सुगम सकल मग तुम्ह कहुँ अहहीं॥1॥ भावार्थ:- (चलते समय) बड़े प्रेम से श्री रामजी ने मुनि से कहा- हे नाथ! बताइए हम किस मार्ग से जाएँ। मुनि मन में हँसक

अयोध्याकाण्ड दोहा 108

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चौपाई :सुनि मुनि बचन रामु सकुचाने। भाव भगति आनंद अघाने॥तब रघुबर मुनि सुजसु सुहावा। कोटि भाँति कहि सबहि सुनावा॥1॥ भावार्थ:- मुनि के वचन सुनकर, उनकी भाव-भक्ति के कारण आनंद से तृप्त हुए भगवान श्री रामचन्द्रजी (लीला की दृष्टि से) सकु

अयोध्याकाण्ड दोहा 107

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चौपाई :कुसल प्रस्न करि आसन दीन्हे। पूजि प्रेम परिपूरन कीन्हे॥कंद मूल फल अंकुर नीके। दिए आनि मुनि मनहुँ अमी के॥1॥ भावार्थ:- कुशल पूछकर मुनिराज ने उनको आसन दिए और प्रेम सहित पूजन करके उन्हें संतुष्ट कर दिया। फिर मानो अमृत के ही बने

अयोध्याकाण्ड दोहा 106

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चौपाई :को कहि सकइ प्रयाग प्रभाऊ। कलुष पुंज कुंजर मृगराऊ॥अस तीरथपति देखि सुहावा। सुख सागर रघुबर सुखु पावा॥1॥ भावार्थ:- पापों के समूह रूपी हाथी के मारने के लिए सिंह रूप प्रयागराज का प्रभाव (महत्व-माहात्म्य) कौन कह सकता है। ऐसे सुहा