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अयोध्याकाण्ड दोहा 97

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चौपाई :बिनती भूप कीन्ह जेहि भाँती। आरति प्रीति न सो कहि जाती॥पितु सँदेसु सुनि कृपानिधाना। सियहि दीन्ह सिख कोटि बिधाना॥1॥ भावार्थ:- राजा ने जिस तरह (जिस दीनता और प्रेम से) विनती की है, वह दीनता और प्रेम कहा नहीं जा सकता। कृपानिधान श

अयोध्याकाण्ड दोहा 96

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चौपाई :तुम्ह पुनि पितु सम अति हित मोरें। बिनती करउँ तात कर जोरें॥सब बिधि सोइ करतब्य तुम्हारें। दुख न पाव पितु सोच हमारें॥1॥ भावार्थ:- आप भी पिता के समान ही मेरे बड़े हितैषी हैं। हे तात! मैं हाथ जोड़कर आप से विनती करता हूँ कि आपका भी 

अयोध्याकाण्ड दोहा 95

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चौपाई :तात कृपा करि कीजिअ सोई। जातें अवध अनाथ न होई॥मंत्रिहि राम उठाइ प्रबोधा। तात धरम मतु तुम्ह सबु सोधा॥1॥ भावार्थ:- (और कहा -) हे तात ! कृपा करके वही कीजिए जिससे अयोध्या अनाथ न हो श्री रामजी ने मंत्री को उठाकर धैर्य बँधाते हुए समझ

अयोध्याकाण्ड दोहा 94

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चौपाई :सखा समुझि अस परिहरि मोहू। सिय रघुबीर चरन रत होहू॥कहत राम गुन भा भिनुसारा। जागे जग मंगल सुखदारा॥1॥ भावार्थ:- हे सखा! ऐसा समझ, मोह को त्यागकर श्री सीतारामजी के चरणों में प्रेम करो। इस प्रकार श्री रामचन्द्रजी के गुण कहते-कहते 

अयोध्याकाण्ड दोहा 93

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चौपाई :अस बिचारि नहिं कीजिअ रोसू। काहुहि बादि न देइअ दोसू॥मोह निसाँ सबु सोवनिहारा। देखिअ सपन अनेक प्रकारा॥1॥ भावार्थ:- ऐसा विचारकर क्रोध नहीं करना चाहिए और न किसी को व्यर्थ दोष ही देना चाहिए। सब लोग मोह रूपी रात्रि में सोने वाले ह

अयोध्याकाण्ड दोहा 92

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चौपाई :भइ दिनकर कुल बिटप कुठारी। कुमति कीन्ह सब बिस्व दुखारी॥भयउ बिषादु निषादहि भारी। राम सीय महि सयन निहारी॥1॥ भावार्थ:- वह सूर्यकुल रूपी वृक्ष के लिए कुल्हाड़ी हो गई। उस कुबुद्धि ने सम्पूर्ण विश्व को दुःखी कर दिया। श्री राम-सी

अयोध्याकाण्ड दोहा 91

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चौपाई :बिबिध बसन उपधान तुराईं। छीर फेन मृदु बिसद सुहाईं॥तहँ सिय रामु सयन निसि करहीं। निज छबि रति मनोज मदु हरहीं॥1॥ भावार्थ:- जहाँ (ओढ़ने-बिछाने के) अनेकों वस्त्र, तकिए और गद्दे हैं, जो दूध के फेन के समान कोमल, निर्मल (उज्ज्वल) और सुंद

अयोध्याकाण्ड दोहा 90

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चौपाई :उठे लखनु प्रभु सोवत जानी। कहि सचिवहि सोवन मृदु बानी॥कछुक दूरि सजि बान सरासन। जागन लगे बैठि बीरासन॥1॥ भावार्थ:- फिर प्रभु श्री रामचन्द्रजी को सोते जानकर लक्ष्मणजी उठे और कोमल वाणी से मंत्री सुमंत्रजी को सोने के लिए कहकर व