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अयोध्याकाण्ड दोहा 121

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चौपाई :नारि सनेह बिकल बस होहीं। चकईं साँझ समय जनु सोहीं॥मृदु पद कमल कठिन मगु जानी। गहबरि हृदयँ कहहिं बर बानी॥1॥ भावार्थ:- स्त्रियाँ स्नेहवश विकल हो जाती हैं। मानो संध्या के समय चकवी (भावी वियोग की पीड़ा से) सोह रही हो। (दुःखी हो रही 

अयोध्याकाण्ड दोहा 120

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चौपाई :जौं ए कंदमूल फल खाहीं। बादि सुधादि असन जग माहीं॥एक कहहिं ए सहज सुहाए। आपु प्रगट भए बिधि न बनाए॥1॥ भावार्थ:- जो ये कन्द, मूल, फल खाते हैं, तो जगत में अमृत आदि भोजन व्यर्थ ही हैं। कोई एक कहते हैं- ये स्वभाव से ही सुंदर हैं (इनका सौं

अयोध्याकाण्ड दोहा 119

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चौपाई :फिरत नारि नर अति पछिताहीं। दैअहि दोषु देहिं मन माहीं॥सहित बिषाद परसपर कहहीं। बिधि करतब उलटे सब अहहीं॥1॥ भावार्थ:- लौटते हुए वे स्त्री-पुरुष बहुत ही पछताते हैं और मन ही मन दैव को दोष देते हैं। परस्पर (बड़े ही) विषाद के साथ कहत

अयोध्याकाण्ड दोहा 118

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चौपाई :पारबती सम पतिप्रिय होहू। देबि न हम पर छाड़ब छोहू॥पुनि पुनि बिनय करिअ कर जोरी। जौं एहि मारग फिरिअ बहोरी॥1॥ भावार्थ:- और पार्वतीजी के समान अपने पति की प्यारी होओ। हे देवी! हम पर कृपा न छोड़ना (बनाए रखना)। हम बार-बार हाथ जोड़कर विनत

अयोध्याकाण्ड दोहा 117

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चौपाई :कोटि मनोज लजावनिहारे। सुमुखि कहहु को आहिं तुम्हारे॥सुनि सनेहमय मंजुल बानी। सकुची सिय मन महुँ मुसुकानी॥1॥ भावार्थ:- हे सुमुखि! कहो तो अपनी सुंदरता से करोड़ों कामदेवों को लजाने वाले ये तुम्हारे कौन हैं? उनकी ऐसी प्रेममयी सु

अयोध्याकाण्ड दोहा 116

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चौपाई :बरनि न जाइ मनोहर जोरी। सोभा बहुत थोरि मति मोरी॥राम लखन सिय सुंदरताई। सब चितवहिं चित मन मति लाई॥1॥ भावार्थ:- उस मनोहर जोड़ी का वर्णन नहीं किया जा सकता, क्योंकि शोभा बहुत अधिक है और मेरी बुद्धि थोड़ी है। श्री राम, लक्ष्मण और सीत

अयोध्याकाण्ड दोहा 115

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चौपाई :एक कलस भरि आनहिं पानी। अँचइअ नाथ कहहिं मृदु बानी॥सुनि प्रिय बचन प्रीति अति देखी। राम कृपाल सुसील बिसेषी॥1॥ भावार्थ:- कोई घड़ा भरकर पानी ले आते हैं और कोमल वाणी से कहते हैं- नाथ! आचमन तो कर लीजिए। उनके प्यारे वचन सुनकर और उनका 

अयोध्याकाण्ड दोहा 114

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चौपाई :सीता लखन सहित रघुराई। गाँव निकट जब निकसहिं जाई॥सुनि सब बाल बृद्ध नर नारी। चलहिं तुरत गृह काजु बिसारी॥1॥ भावार्थ:- सीताजी और लक्ष्मणजी सहित श्री रघुनाथजी जब किसी गाँव के पास जा निकलते हैं, तब उनका आना सुनते ही बालक-बूढ़े, स्त