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अयोध्याकाण्ड दोहा 89

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चौपाई :राम लखन सिय रूप निहारी। कहहिं सप्रेम ग्राम नर नारी॥ते पितु मातु कहहु सखि कैसे। जिन्ह पठए बन बालक ऐसे॥1॥ भावार्थ:- श्री रामजी, लक्ष्मणजी और सीताजी के रूप को देखकर गाँव के स्त्री-पुरुष प्रेम के साथ चर्चा करते हैं। (कोई कहती है

अयोध्याकाण्ड दोहा 88

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चौपाई :यह सुधि गुहँ निषाद जब पाई। मुदित लिए प्रिय बंधु बोलाई॥लिए फल मूल भेंट भरि भारा। मिलन चलेउ हियँ हरषु अपारा॥1॥ भावार्थ:- जब निषादराज गुह ने यह खबर पाई, तब आनंदित होकर उसने अपने प्रियजनों और भाई-बंधुओं को बुला लिया और भेंट देने

अयोध्याकाण्ड दोहा 87

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चौपाई :सीता सचिव सहित दोउ भाई। सृंगबेरपुर पहुँचे जाई॥उतरे राम देवसरि देखी। कीन्ह दंडवत हरषु बिसेषी॥1॥ भावार्थ:- सीताजी और मंत्री सहित दोनों भाई श्रृंगवेरपुर जा पहुँचे। वहाँ गंगाजी को देखकर श्री रामजी रथ से उतर पड़े और बड़े हर्

अयोध्याकाण्ड दोहा 86

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चौपाई :जागे सकल लोग भएँ भोरू। गे रघुनाथ भयउ अति सोरू॥रथ कर खोज कतहुँ नहिं पावहिं। राम राम कहि चहुँ दिसि धावहिं॥1॥ भावार्थ:- सबेरा होते ही सब लोग जागे, तो बड़ा शोर मचा कि रघुनाथजी चले गए। कहीं रथ का खोज नहीं पाते, सब ‘हा राम! हा राम!’ प

अयोध्याकाण्ड दोहा 85

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चौपाई :रघुपति प्रजा प्रेमबस देखी। सदय हृदयँ दुखु भयउ बिसेषी॥करुनामय रघुनाथ गोसाँई। बेगि पाइअहिं पीर पराई॥1॥ भावार्थ:- प्रजा को प्रेमवश देखकर श्री रघुनाथजी के दयालु हृदय में बड़ा दुःख हुआ। प्रभु श्री रघुनाथजी करुणामय हैं। परा

अयोध्याकाण्ड दोहा 84

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चौपाई :राम बियोग बिकल सब ठाढ़े। जहँ तहँ मनहुँ चित्र लिखि काढ़े॥नगरु सफल बनु गहबर भारी। खग मृग बिपुल सकल नर नारी॥1॥ भावार्थ:- श्री रामजी के वियोग में सभी व्याकुल हुए जहाँ-तहाँ (ऐसे चुपचाप स्थिर होकर) खड़े हैं, मानो तसवीरों में लिखकर

अयोध्याकाण्ड दोहा 83

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चौपाई :तब सुमंत्र नृप बचन सुनाए। करि बिनती रथ रामु चढ़ाए॥चढ़ि रथ सीय सहित दोउ भाई। चले हृदयँ अवधहि सिरु नाई॥1॥ भावार्थ:- तब (वहाँ पहुँचकर) सुमंत्र ने राजा के वचन श्री रामचन्द्रजी को सुनाए और विनती करके उनको रथ पर चढ़ाया। सीताजी सह

अयोध्याकाण्ड दोहा 82

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चौपाई :जौं नहिं फिरहिं धीर दोउ भाई। सत्यसंध दृढ़ब्रत रघुराई॥तौ तुम्ह बिनय करेहु कर जोरी। फेरिअ प्रभु मिथिलेसकिसोरी॥1॥॥ भावार्थ:- यदि धैर्यवान दोनों भाई न लौटें- क्योंकि श्री रघुनाथजी प्रण के सच्चे और दृढ़ता से नियम का पालन करन