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अयोध्याकाण्ड दोहा 81

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चौपाई :एहि बिधि राम सबहि समुझावा। गुर पद पदुम हरषि सिरु नावा॥गनपति गौरि गिरीसु मनाई। चले असीस पाइ रघुराई॥1॥ भावार्थ:- इस प्रकार श्री रामजी ने सबको समझाया और हर्षित होकर गुरुजी के चरणकमलों में सिर नवाया। फिर गणेशजी, पार्वतीजी और 

अयोध्याकांड दोहा 80

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चौपाई :निकसि बसिष्ठ द्वार भए ठाढ़े। देखे लोग बिरह दव दाढ़े॥कहि प्रिय बचन सकल समुझाए। बिप्र बृंद रघुबीर बोलाए॥1॥ भावार्थ:- राजमहल से निकलकर श्री रामचन्द्रजी वशिष्ठजी के दरवाजे पर जा खड़े हुए और देखा कि सब लोग विरह की अग्नि में जल 

अयोध्याकांड दोहा 79

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चौपाई :सीय सकुच बस उतरु न देई। सो सुनि तमकि उठी कैकेई॥मुनि पट भूषन भाजन आनी। आगें धरि बोली मृदु बानी॥1॥ भावार्थ:- सीताजी संकोचवश उत्तर नहीं देतीं। इन बातों को सुनकर कैकेयी तमककर उठी। उसने मुनियों के वस्त्र, आभूषण (माला, मेखला आदि) 

अयोध्याकांड दोहा 78

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चौपाई :रायँ राम राखन हित लागी। बहुत उपाय किए छलु त्यागी॥लखी राम रुख रहत न जाने। धरम धुरंधर धीर सयाने॥1॥ भावार्थ:- राजा ने इस प्रकार श्री रामचन्द्रजी को रखने के लिए छल छोड़कर बहुत से उपाय किए, पर जब उन्होंने धर्मधुरंधर, धीर और बुद्ध

अयोध्याकांड दोहा 77

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चौपाई :सकइ न बोलि बिकल नरनाहू। सोक जनित उर दारुन दाहू॥नाइ सीसु पद अति अनुरागा। उठि रघुबीर बिदा तब मागा॥1॥ भावार्थ:- राजा व्याकुल हैं, बोल नहीं सकते। हृदय में शोक से उत्पन्न हुआ भयानक सन्ताप है। तब रघुकुल के वीर श्री रामचन्द्रजी न

अयोध्याकांड दोहा 76

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चौपाई :गए लखनु जहँ जानकिनाथू। भे मन मुदित पाइ प्रिय साथू॥बंदि राम सिय चरन सुहाए। चले संग नृपमंदिर आए॥1॥ भावार्थ:- लक्ष्मणजी वहाँ गए जहाँ श्री जानकीनाथजी थे और प्रिय का साथ पाकर मन में बड़े ही प्रसन्न हुए। श्री रामजी और सीताजी के 

अयोध्याकांड दोहा 75

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चौपाई :पुत्रवती जुबती जग सोई। रघुपति भगतु जासु सुतु होई॥नतरु बाँझ भलि बादि बिआनी। राम बिमुख सुत तें हित जानी॥1॥ भावार्थ:- संसार में वही युवती स्त्री पुत्रवती है, जिसका पुत्र श्री रघुनाथजी का भक्त हो। नहीं तो जो राम से विमुख पुत्र

अयोध्याकांड दोहा 74

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चौपाई :धीरजु धरेउ कुअवसर जानी। सहज सुहृद बोली मृदु बानी॥तात तुम्हारि मातु बैदेही। पिता रामु सब भाँति सनेही॥1॥ भावार्थ:- परन्तु कुसमय जानकर धैर्य धारण किया और स्वभाव से ही हित चाहने वाली सुमित्राजी कोमल वाणी से बोलीं- हे तात! जान