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अयोध्याकाण्ड दोहा 105

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चौपाई :तेहि दिन भयउ बिटप तर बासू। लखन सखाँ सब कीन्ह सुपासू॥प्रात प्रातकृत करि रघुराई। तीरथराजु दीख प्रभु जाई॥1॥ भावार्थ:- उस दिन पेड़ के नीचे निवास हुआ। लक्ष्मणजी और सखा गुह ने (विश्राम की) सब सुव्यवस्था कर दी। प्रभु श्री रामचन्द्

अयोध्याकाण्ड दोहा 104

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चौपाई :गंग बचन सुनि मंगल मूला। मुदित सीय सुरसरि अनुकूला॥तब प्रभु गुहहि कहेउ घर जाहू। सुनत सूख मुखु भा उर दाहू॥1॥ भावार्थ:- मंगल के मूल गंगाजी के वचन सुनकर और देवनदी को अनुकूल देखकर सीताजी आनंदित हुईं। तब प्रभु श्री रामचन्द्रजी न

अयोध्याकाण्ड दोहा 103

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चौपाई :तब मज्जनु करि रघुकुलनाथा। पूजि पारथिव नायउ माथा॥सियँ सुरसरिहि कहेउ कर जोरी। मातु मनोरथ पुरउबि मोरी॥1॥ भावार्थ:- फिर रघुकुल के स्वामी श्री रामचन्द्रजी ने स्नान करके पार्थिव पूजा की और शिवजी को सिर नवाया। सीताजी ने हाथ जो

अयोध्याकाण्ड दोहा 102

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चौपाई :उतरि ठाढ़ भए सुरसरि रेता। सीय रामुगुह लखन समेता॥केवट उतरि दंडवत कीन्हा। प्रभुहि सकुच एहि नहिं कछु दीन्हा॥1॥ भावार्थ:- निषादराज और लक्ष्मणजी सहित श्री सीताजी और श्री रामचन्द्रजी (नाव से) उतरकर गंगाजी की रेत (बालू) में खड़े हो

अयोध्याकाण्ड दोहा 101

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चौपाई :कृपासिंधु बोले मुसुकाई। सोइ करु जेहिं तव नाव न जाई॥बेगि आनु जलपाय पखारू। होत बिलंबु उतारहि पारू॥1॥ भावार्थ:- कृपा के समुद्र श्री रामचन्द्रजी केवट से मुस्कुराकर बोले भाई! तू वही कर जिससे तेरी नाव न जाए। जल्दी पानी ला और पैर

अयोध्याकाण्ड दोहा 100

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चौपाई :जासु बियोग बिकल पसु ऐसें। प्रजा मातु पितु जिइहहिं कैसें॥बरबस राम सुमंत्रु पठाए। सुरसरि तीर आपु तब आए॥1॥ भावार्थ:- जिनके वियोग में पशु इस प्रकार व्याकुल हैं, उनके वियोग में प्रजा, माता और पिता कैसे जीते रहेंगे? श्री रामचन्द

अयोध्याकाण्ड दोहा 99

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चौपाई :प्राननाथ प्रिय देवर साथा। बीर धुरीन धरें धनु भाथा॥नहिं मग श्रमु भ्रमु दुख मन मोरें। मोहि लगि सोचु करिअ जनि भोरें॥1॥ भावार्थ:- वीरों में अग्रगण्य तथा धनुष और (बाणों से भरे) तरकश धारण किए मेरे प्राणनाथ और प्यारे देवर साथ हैं

अयोध्याकाण्ड दोहा 98

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चौपाई :पितु बैभव बिलास मैं डीठा। नृप मनि मुकुट मिलित पद पीठा॥सुखनिधान अस पितु गृह मोरें। पिय बिहीन मन भाव न भोरें॥1॥ भावार्थ:- मैंने पिताजी के ऐश्वर्य की छटा देखी है, जिनके चरण रखने की चौकी से सर्वशिरोमणि राजाओं के मुकुट मिलते है