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अयोध्याकाण्ड दोहा 137

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चौपाई :रामहि केवल प्रेमु पिआरा। जानि लेउ जो जान निहारा॥राम सकल बनचर तब तोषे। कहि मृदु बचन प्रेम परिपोषे॥1॥ भावार्थ:- श्री रामचन्द्रजी को केवल प्रेम प्यारा है, जो जानने वाला हो (जानना चाहता हो), वह जान ले। तब श्री रामचन्द्रजी ने प्र

अयोध्याकाण्ड दोहा 136

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चौपाई :धन्य भूमि बन पंथ पहारा। जहँ जहँ नाथ पाउ तुम्ह धारा॥धन्य बिहग मृग काननचारी। सफल जनम भए तुम्हहि निहारी॥1॥ भावार्थ:- हे नाथ! जहाँ-जहाँ आपने अपने चरण रखे हैं, वे पृथ्वी, वन, मार्ग और पहाड़ धन्य हैं, वे वन में विचरने वाले पक्षी और पश

अयोध्याकाण्ड दोहा 135

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चौपाई :यह सुधि कोल किरातन्ह पाई। हरषे जनु नव निधि घर आई॥कंद मूल फल भरि भरि दोना। चले रंक जनु लूटन सोना॥1॥ भावार्थ:- यह (श्री रामजी के आगमन का) समाचार जब कोल-भीलों ने पाया, तो वे ऐसे हर्षित हुए मानो नवों निधियाँ उनके घर ही पर आ गई हों। व

अयोध्याकाण्ड दोहा 134

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चौपाई :अमर नाग किंनर दिसिपाला। चित्रकूट आए तेहि काला॥राम प्रनामु कीन्ह सब काहू। मुदित देव लहि लोचन लाहू॥1॥ भावार्थ:- उस समय देवता, नाग, किन्नर और दिक्पाल चित्रकूट में आए और श्री रामचन्द्रजी ने सब किसी को प्रणाम किया। देवता नेत्र

अयोध्याकाण्ड दोहा 133

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चौपाई :रघुबर कहेउ लखन भल घाटू। करहु कतहुँ अब ठाहर ठाटू॥लखन दीख पय उतर करारा। चहुँ दिसि फिरेउ धनुष जिमि नारा॥1॥ भावार्थ:- श्री रामचन्द्रजी ने कहा- लक्ष्मण! बड़ा अच्छा घाट है। अब यहीं कहीं ठहरने की व्यवस्था करो। तब लक्ष्मणजी ने पयस्

अयोध्याकाण्ड दोहा 132

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चौपाई :एहि बिधि मुनिबर भवन देखाए। बचन सप्रेम राम मन भाए॥कह मुनि सुनहु भानुकुलनायक। आश्रम कहउँ समय सुखदायक॥1॥ भावार्थ:- इस प्रकार मुनि श्रेष्ठ वाल्मीकिजी ने श्री रामचन्द्रजी को घर दिखाए। उनके प्रेमपूर्ण वचन श्री रामजी के मन को 

अयोध्याकाण्ड दोहा 131

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चौपाई :अवगुन तजि सब के गुन गहहीं। बिप्र धेनु हित संकट सहहीं॥नीति निपुन जिन्ह कइ जग लीका। घर तुम्हार तिन्ह कर मनु नीका॥1॥ भावार्थ:- जो अवगुणों को छोड़कर सबके गुणों को ग्रहण करते हैं, ब्राह्मण और गो के लिए संकट सहते हैं, नीति-निपुणता 

अयोध्याकाण्ड दोहा 130

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चौपाई :काम कोह मद मान न मोहा। लोभ न छोभ न राग न द्रोहा॥जिन्ह कें कपट दंभ नहिं माया। तिन्ह कें हृदय बसहु रघुराया॥1॥ भावार्थ:- जिनके न तो काम, क्रोध, मद, अभिमान और मोह हैं, न लोभ है, न क्षोभ है, न राग है, न द्वेष है और न कपट, दम्भ और माया ही है-