अयोध्याकाण्ड दोहा 145
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चौपाई :जिमि कुलीन तिय साधु सयानी। पतिदेवता करम मन बानी॥रहै करम बस परिहरि नाहू। सचिव हृदयँ तिमि दारुन दाहू॥1॥ भावार्थ:- जैसे किसी उत्तम कुलवाली, साधु स्वाभाव की, समझदार और मन, वचन, कर्म से पति को ही देवता मानने वाली पतिव्रता स्त्री