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अयोध्याकाण्ड दोहा 145

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चौपाई :जिमि कुलीन तिय साधु सयानी। पतिदेवता करम मन बानी॥रहै करम बस परिहरि नाहू। सचिव हृदयँ तिमि दारुन दाहू॥1॥ भावार्थ:- जैसे किसी उत्तम कुलवाली, साधु स्वाभाव की, समझदार और मन, वचन, कर्म से पति को ही देवता मानने वाली पतिव्रता स्त्री 

अयोध्याकाण्ड दोहा 144

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चौपाई :गुह सारथिहि फिरेउ पहुँचाई। बिरहु बिषादु बरनि नहिं जाई॥चले अवध लेइ रथहि निषादा। होहिं छनहिं छन मगन बिषादा॥1॥ भावार्थ:- निषादराज गुह सारथी (सुमंत्रजी) को पहुँचाकर (विदा करके) लौटा। उसके विरह और दुःख का वर्णन नहीं किया जा सकत

अयोध्याकाण्ड दोहा 143

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चौपाई :धरि धीरजु तब कहइ निषादू। अब सुमंत्र परिहरहु बिषादू॥तुम्ह पंडित परमारथ ग्याता। धरहु धीर लखि बिमुख बिधाता॥1॥ भावार्थ:- तब धीरज धरकर निषादराज कहने लगा- हे सुमंत्रजी! अब विषाद को छोड़िए। आप पंडित और परमार्थ के जानने वाले हैं। 

अयोध्याकाण्ड दोहा 142

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चौपाई :जोगवहिं प्रभुसिय लखनहि कैसें। पलक बिलोचन गोलक जैसें॥सेवहिं लखनु सीय रघुबीरहि। जिमि अबिबेकी पुरुष सरीरहि॥1॥ भावार्थ:- प्रभु श्री रामचन्द्रजी सीताजी और लक्ष्मणजी की कैसी सँभाल रखते हैं, जैसे पलकें नेत्रों के गोलकों की। 

अयोध्याकाण्ड दोहा 141

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चौपाई :सीय लखन जेहि बिधि सुखु लहहीं। सोइ रघुनाथ करहिं सोइ कहहीं॥कहहिं पुरातन कथा कहानी। सुनहिं लखनु सिय अति सुखु मानी॥1॥ भावार्थ:- सीताजी और लक्ष्मणजी को जिस प्रकार सुख मिले, श्री रघुनाथजी वही करते और वही कहते हैं। भगवान प्राची

अयोध्याकाण्ड दोहा 140

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चौपाई :राम संग सिय रहति सुखारी। पुर परिजन गृह सुरति बिसारी॥छिनु छिनु पिय बिधु बदनु निहारी। प्रमुदित मनहुँ चकोर कुमारी॥1॥ भावार्थ:- श्री रामचन्द्रजी के साथ सीताजी अयोध्यापुरी, कुटुम्ब के लोग और घर की याद भूलकर बहुत ही सुखी रहती 

अयोध्याकाण्ड दोहा 139

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चौपाई :नयनवंत रघुबरहि बिलोकी। पाइ जनम फल होहिं बिसोकी॥परसि चरन रज अचर सुखारी। भए परम पद के अधिकारी॥1॥ भावार्थ:- आँखों वाले जीव श्री रामचन्द्रजी को देखकर जन्म का फल पाकर शोकरहित हो जाते हैं और अचर (पर्वत, वृक्ष, भूमि, नदी आदि) भगवान 

अयोध्याकाण्ड दोहा 138

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चौपाई :करि केहरि कपि कोल कुरंगा। बिगतबैर बिचरहिं सब संगा॥फिरत अहेर राम छबि देखी। होहिं मुदित मृग बृंद बिसेषी॥1॥ भावार्थ:- हाथी, सिंह, बंदर, सूअर और हिरन, ये सब वैर छोड़कर साथ-साथ विचरते हैं। शिकार के लिए फिरते हुए श्री रामचन्द्रजी क