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अयोध्याकाण्ड दोहा 129

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चौपाई :प्रभु प्रसाद सुचि सुभग सुबासा। सादर जासु लहइ नित नासा॥तुम्हहि निबेदित भोजन करहीं। प्रभु प्रसाद पट भूषन धरहीं॥1॥ भावार्थ:- जिसकी नासिका प्रभु (आप) के पवित्र और सुगंधित (पुष्पादि) सुंदर प्रसाद को नित्य आदर के साथ ग्रहण करती 

अयोध्याकाण्ड दोहा 128

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चौपाई :सुनि मुनि बचन प्रेम रस साने। सकुचि राम मन महुँ मुसुकाने॥बालमीकि हँसि कहहिं बहोरी। बानी मधुर अमिअ रस बोरी॥1॥ भावार्थ:- मुनि के प्रेमरस से सने हुए वचन सुनकर श्री रामचन्द्रजी रहस्य खुल जाने के डर से सकुचाकर मन में मुस्कुराए

अयोध्याकाण्ड दोहा 127

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चौपाई :जगु पेखन तुम्ह देखनिहारे। बिधि हरि संभु नचावनिहारे॥तेउ न जानहिं मरमु तुम्हारा। औरु तुम्हहि को जाननिहारा॥1॥ भावार्थ:- हे राम! जगत दृश्य है, आप उसके देखने वाले हैं। आप ब्रह्मा, विष्णु और शंकर को भी नचाने वाले हैं। जब वे भी आप

अयोध्याकाण्ड दोहा 126

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चौपाई :देखि पाय मुनिराय तुम्हारे। भए सुकृत सब सुफल हमारे॥॥अब जहँ राउर आयसु होई। मुनि उदबेगु न पावै कोई॥1॥ भावार्थ:- हे मुनिराज! आपके चरणों का दर्शन करने से आज हमारे सब पुण्य सफल हो गए (हमें सारे पुण्यों का फल मिल गया)। अब जहाँ आपकी आ

अयोध्याकाण्ड दोहा 125

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चौपाई :मुनि कहुँ राम दंडवत कीन्हा। आसिरबादु बिप्रबर दीन्हा॥देखि राम छबि नयन जुड़ाने। करि सनमानु आश्रमहिं आने॥1॥ भावार्थ:- श्री रामचन्द्रजी ने मुनि को दण्डवत किया। विप्र श्रेष्ठ मुनि ने उन्हें आशीर्वाद दिया। श्री रामचन्द्रजी 

अयोध्याकाण्ड दोहा 124

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चौपाई :अजहुँ जासु उर सपनेहुँ काऊ। बसहुँ लखनु सिय रामु बटाऊ॥राम धाम पथ पाइहि सोई। जो पथ पाव कबहु मुनि कोई॥1॥ भावार्थ:- आज भी जिसके हृदय में स्वप्न में भी कभी लक्ष्मण, सीता, राम तीनों बटोही आ बसें, तो वह भी श्री रामजी के परमधाम के उस मा

अयोध्याकाण्ड दोहा 123

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चौपाई :आगें रामु लखनु बने पाछें। तापस बेष बिराजत काछें॥उभय बीच सिय सोहति कैसें। ब्रह्म जीव बिच माया जैसें॥1॥ भावार्थ:- आगे श्री रामजी हैं, पीछे लक्ष्मणजी सुशोभित हैं। तपस्वियों के वेष बनाए दोनों बड़ी ही शोभा पा रहे हैं। दोनों के ब

अयोध्याकाण्ड दोहा 122

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चौपाई :गाँव गाँव अस होइ अनंदू। देखि भानुकुल कैरव चंदू॥जे कछु समाचार सुनि पावहिं। ते नृप रानिहि दोसु लगावहिं॥1॥ भावार्थ:- सूर्यकुल रूपी कुमुदिनी को प्रफुल्लित करने वाले चन्द्रमा स्वरूप श्री रामचन्द्रजी के दर्शन कर गाँव-गाँव मे