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अयोध्याकांड दोहा 177

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चौपाई :मोहि उपदेसु दीन्ह गुरु नीका। प्रजा सचिव संमत सबही का॥मातु उचित धरि आयसु दीन्हा। अवसि सीस धरि चाहउँ कीन्हा॥1॥ भावार्थ:- गुरुजी ने मुझे सुंदर उपदेश दिया। (फिर) प्रजा, मंत्री आदि सभी को यही सम्मत है। माता ने भी उचित समझकर ही आज

अयोध्याकांड दोहा 176

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चौपाई :कौसल्या धरि धीरजु कहई। पूत पथ्य गुर आयसु अहई॥सो आदरिअ करिअ हित मानी। तजिअ बिषादु काल गति जानी॥1॥ भावार्थ:- कौसल्याजी भी धीरज धरकर कह रही हैं- हे पुत्र! गुरुजी की आज्ञा पथ्य रूप है। उसका आदर करना चाहिए और हित मानकर उसका पालन 

अयोध्याकांड दोहा 175

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चौपाई :अवसि नरेस बचन फुर करहू। पालहु प्रजा सोकु परिहरहू॥सुरपुर नृपु पाइहि परितोषू। तुम्ह कहुँ सुकृतु सुजसु नहिं दोषू॥1॥ भावार्थ:- राजा का वचन अवश्य सत्य करो। शोक त्याग दो और प्रजा का पालन करो। ऐसा करने से स्वर्ग में राजा संतोष प

अयोध्याकांड दोहा 174

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चौपाई :सब प्रकार भूपति बड़भागी। बादि बिषादु करिअ तेहि लागी॥यह सुनि समुझि सोचु परिहरहू। सिर धरि राज रजायसु करहू॥1॥ भावार्थ:- राजा सब प्रकार से बड़भागी थे। उनके लिए विषाद करना व्यर्थ है। यह सुन और समझकर सोच त्याग दो और राजा की आज्ञा 

अयोध्याकांड दोहा 173

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चौपाई :बैखानस सोइ सोचै जोगू। तपु बिहाइ जेहि भावइ भोगू॥सोचिअ पिसुन अकारन क्रोधी। जननि जनक गुर बंधु बिरोधी॥1॥ भावार्थ:- वानप्रस्थ वही सोच करने योग्य है, जिसको तपस्या छोड़कर भोग अच्छे लगते हैं। सोच उसका करना चाहिए जो चुगलखोर है, बिन

अयोध्याकांड दोहा 172

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चौपाई :अस बिचारि केहि देइअ दोसू। ब्यरथ काहि पर कीजिअ रोसू॥तात बिचारु करहु मन माहीं। सोच जोगु दसरथु नृपु नाहीं॥1॥ भावार्थ:- ऐसा विचार कर किसे दोष दिया जाए? और व्यर्थ किस पर क्रोध किया जाए? हे तात! मन में विचार करो। राजा दशरथ सोच करने 

अयोध्याकांड दोहा 171

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चौपाई :पितु हित भरत कीन्हि जसि करनी। सो मुख लाख जाइ नहिं बरनी॥सुदिनु सोधि मुनिबर तब आए। सचिव महाजन सकल बोलाए॥1॥ भावार्थ:- पिताजी के लिए भरतजी ने जैसी करनी की वह लाखों मुखों से भी वर्णन नहीं की जा सकती। तब शुभ दिन शोधकर श्रेष्ठ मुनि

अयोध्याकांड दोहा 170

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चौपाई :नृपतनु बेद बिदित अन्हवावा। परम बिचित्र बिमानु बनावा॥गाहि पदभरत मातु सब राखी। रहीं रानि दरसन अभिलाषी॥1॥ भावार्थ:- वेदों में बताई हुई विधि से राजा की देह को स्नान कराया गया और परम विचित्र विमान बनाया गया। भरतजी ने सब माताओ