अयोध्याकांड दोहा 169
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चौपाई :राम प्रानहु तें प्रान तुम्हारे। तुम्ह रघुपतिहि प्रानहु तें प्यारे॥बिधु बिष चवै स्रवै हिमु आगी। होइ बारिचर बारि बिरागी॥1॥ भावार्थ:- श्री राम तुम्हारे प्राणों से भी बढ़कर प्राण (प्रिय) हैं और तुम भी श्री रघुनाथ को प्राणों स