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अयोध्याकांड दोहा 169

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चौपाई :राम प्रानहु तें प्रान तुम्हारे। तुम्ह रघुपतिहि प्रानहु तें प्यारे॥बिधु बिष चवै स्रवै हिमु आगी। होइ बारिचर बारि बिरागी॥1॥ भावार्थ:- श्री राम तुम्हारे प्राणों से भी बढ़कर प्राण (प्रिय) हैं और तुम भी श्री रघुनाथ को प्राणों स

अयोध्याकांड दोहा 168

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चौपाई :बेचहिं बेदु धरमु दुहि लेहीं। पिसुन पराय पाप कहि देहीं॥कपटी कुटिल कलहप्रिय क्रोधी। बेद बिदूषक बिस्व बिरोधी॥1॥ भावार्थ:- जो लोग वेदों को बेचते हैं, धर्म को दुह लेते हैं, चुगलखोर हैं, दूसरों के पापों को कह देते हैं, जो कपटी, कु

अयोध्याकांड दोहा 167

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चौपाई :बिलपहिं बिकल भरत दोउ भाई। कौसल्याँ लिए हृदयँ लगाई॥भाँति अनेक भरतु समुझाए। कहि बिबेकमय बचन सुनाए॥1॥ भावार्थ:- भरत, शत्रुघ्न दोनों भाई विकल होकर विलाप करने लगे। तब कौसल्याजी ने उनको हृदय से लगा लिया। अनेकों प्रकार से भरतजी

अयोध्याकांड दोहा 166

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चौपाई :मुख प्रसन्न मन रंग न रोषू। सब कर सब बिधि करि परितोषू॥चले बिपिन सुनि सिय सँग लागी। रहइ न राम चरन अनुरागी॥1॥ भावार्थ:- उनका मुख प्रसन्न था, मन में न आसक्ति थी, न रोष (द्वेष)। सबका सब तरह से संतोष कराकर वे वन को चले। यह सुनकर सीता भ

अयोध्याकांड दोहा 165

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चौपाई :सरल सुभाय मायँ हियँ लाए। अति हित मनहुँ राम फिरि आए॥भेंटेउ बहुरि लखन लघु भाई। सोकु सनेहु न हृदयँ समाई॥1॥ भावार्थ:- सरल स्वभाव वाली माता ने बड़े प्रेम से भरतजी को छाती से लगा लिया, मानो श्री रामजी ही लौटकर आ गए हों। फिर लक्ष्मण

अयोध्याकांड दोहा 164

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चौपाई :भरतहि देखि मातु उठि धाई। मुरुचित अवनि परी झइँ आई॥देखत भरतु बिकल भए भारी। परे चरन तन दसा बिसारी॥1॥ भावार्थ:- भरत को देखते ही माता कौसल्याजी उठ दौड़ीं। पर चक्कर आ जाने से मूर्च्छित होकर पृथ्वी पर गिर पड़ीं। यह देखते ही भरतजी बड़

अयोध्याकांड दोहा 163

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चौपाई :सुनि सत्रुघुन मातु कुटिलाई। जरहिं गात रिस कछु न बसाई॥तेहि अवसर कुबरी तहँ आई। बसन बिभूषन बिबिध बनाई॥1॥ भावार्थ:- माता की कुटिलता सुनकर शत्रुघ्नजी के सब अंग क्रोध से जल रहे हैं, पर कुछ वश नहीं चलता। उसी समय भाँति-भाँति के कपड़

अयोध्याकांड दोहा 162

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चौपाई :जब मैं कुमति कुमत जियँ ठयऊ। खंड खंड होइ हृदउ न गयऊ॥बर मागत मन भइ नहिं पीरा। गरि न जीह मुँह परेउ न कीरा॥1॥ भावार्थ:- अरी कुमति! जब तूने हृदय में यह बुरा विचार (निश्चय) ठाना, उसी समय तेरे हृदय के टुकड़े-टुकड़े (क्यों) न हो गए? वरदान मा