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अयोध्याकांड दोहा 161

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चौपाई:बिकल बिलोकि सुतहि समुझावति। मनहुँ जरे पर लोनु लगावति॥तात राउ नहिं सोचै जोगू। बिढ़इ सुकृत जसु कीन्हेउ भोगू॥1॥ भावार्थ:- पुत्र को व्याकुल देखकर कैकेयी समझाने लगी। मानो जले पर नमक लगा रही हो। (वह बोली-) हे तात! राजा सोच करने योग

अयोध्याकांड दोहा 160

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चौपाई :तात बात मैं सकल सँवारी। भै मंथरा सहाय बिचारी॥कछुक काज बिधि बीच बिगारेउ। भूपति सुरपति पुर पगु धारेउ॥1॥ भावार्थ:- हे तात! मैंने सारी बात बना ली थी। बेचारी मंथरा सहायक हुई। पर विधाता ने बीच में जरा सा काम बिगाड़ दिया। वह यह कि र

अयोध्याकांड दोहा 159

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श्री भरत-शत्रुघ्न का आगमन और शोक चौपाई:हाट बाट नहिं जाइ निहारी। जनु पुर दहँ दिसि लागि दवारी॥आवत सुत सुनि कैकयनंदिनि। हरषी रबिकुल जलरुह चंदिनि॥1॥ भावार्थ:- बाजार और रास्ते देखे नहीं जाते। मानो नगर में दसों दिशाओं में दावाग्नि 

अयोध्याकांड दोहा 158

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चौपाई :चले समीर बेग हय हाँके। नाघत सरित सैल बन बाँके॥हृदयँ सोचु बड़ कछु न सोहाई। अस जानहिं जियँ जाउँ उड़ाई॥1॥ भावार्थ:- हवा के समान वेग वाले घोड़ों को हाँकते हुए वे विकट नदी, पहाड़ तथा जंगलों को लाँघते हुए चले। उनके हृदय में बड़ा स

अयोध्याकांड दोहा 157

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चौपाई :तेल नावँ भरि नृप तनु राखा। दूत बोलाइ बहुरि अस भाषा॥धावहु बेगि भरत पहिं जाहू। नृप सुधि कतहुँ कहहु जनि काहू॥1॥ भावार्थ:- वशिष्ठजी ने नाव में तेल भरवाकर राजा के शरीर को उसमें रखवा दिया। फिर दूतों को बुलवाकर उनसे ऐसा कहा- तुम लो

अयोध्याकांड दोहा 156

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चौपाई :जिअन मरन फलु दसरथ पावा। अंड अनेक अमल जसु छावा॥जिअत राम बिधु बदनु निहारा। राम बिरह करि मरनु सँवारा॥1॥ भावार्थ:- जीने और मरने का फल तो दशरथजी ने ही पाया, जिनका निर्मल यश अनेकों ब्रह्मांडों में छा गया। जीते जी तो श्री रामचन्द्

अयोध्याकांड दोहा 155

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चौपाई :धरि धीरजु उठि बैठ भुआलू। कहु सुमंत्र कहँ राम कृपालू॥कहाँ लखनु कहँ रामु सनेही। कहँ प्रिय पुत्रबधू बैदेही॥1॥ भावार्थ:- धीरज धरकर राजा उठ बैठे और बोले- सुमंत्र! कहो, कृपालु श्री राम कहाँ हैं? लक्ष्मण कहाँ हैं? स्नेही राम कहाँ ह

अयोध्याकांड दोहा 154

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चौपाई :प्रान कंठगत भयउ भुआलू। मनि बिहीन जनु ब्याकुल ब्यालू॥इंद्रीं सकल बिकल भइँ भारी। जनु सर सरसिज बनु बिनु बारी॥1॥ भावार्थ:- राजा के प्राण कंठ में आ गए। मानो मणि के बिना साँप व्याकुल (मरणासन्न) हो गया हो। इन्द्रियाँ सब बहुत ही वि