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अयोध्याकाण्ड दोहा 241

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चौपाई :मिलनि प्रीति किमि जाइ बखानी। कबिकुल अगम करम मन बानी॥परम प्रेम पूरन दोउ भाई। मन बुधि चित अहमिति बिसराई॥1॥ भावार्थ:- मिलन की प्रीति कैसे बखानी जाए? वह तो कविकुल के लिए कर्म, मन, वाणी तीनों से अगम है। दोनों भाई (भरतजी और श्री राम

अयोध्याकाण्ड दोहा 240

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चौपाई :सानुज सखा समेत मगन मन। बिसरे हरष सोक सुख दुख गन॥पाहि नाथ कहि पाहि गोसाईं। भूतल परे लकुट की नाईं॥1॥ भावार्थ:- छोटे भाई शत्रुघ्न और सखा निषादराज समेत भरतजी का मन (प्रेम में) मग्न हो रहा है। हर्ष-शोक, सुख-दुःख आदि सब भूल गए। हे ना

अयोध्याकाण्ड दोहा 239

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चौपाई :सखा समेत मनोहर जोटा। लखेउ न लखन सघन बन ओटा॥भरत दीख प्रभु आश्रमु पावन। सकल सुमंगल सदनु सुहावन॥1॥ भावार्थ:- सखा निषादराज सहित इस मनोहर जोड़ी को सघन वन की आड़ के कारण लक्ष्मणजी नहीं देख पाए। भरतजी ने प्रभु श्री रामचन्द्रजी के स

अयोध्याकाण्ड दोहा 238

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चौपाई :सखा बचन सुनि बिटप निहारी। उमगे भरत बिलोचन बारी॥करत प्रनाम चले दोउ भाई। कहत प्रीति सारद सकुचाई॥1॥ भावार्थ:- सखा के वचन सुनकर और वृक्षों को देखकर भरतजी के नेत्रों में जल उमड़ आया। दोनों भाई प्रणाम करते हुए चले। उनके प्रेम का 

अयोध्याकाण्ड दोहा 237

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चौपाई :तब केवट ऊँचे चढ़ि धाई। कहेउ भरत सन भुजा उठाई॥नाथ देखिअहिं बिटप बिसाला। पाकरि जंबु रसाल तमाला॥1॥ भावार्थ:- तब केवट दौड़कर ऊँचे चढ़ गया और भुजा उठाकर भरजी से कहने लगा- हे नाथ! ये जो पाकर, जामुन, आम और तमाल के विशाल वृक्ष दिखाई देते 

अयोध्याकाण्ड दोहा 236

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चौपाई :बन प्रदेस मुनि बास घनेरे। जनु पुर नगर गाउँ गन खेरे॥बिपुल बिचित्र बिहग मृग नाना। प्रजा समाजु न जाइ बखाना॥1॥ भावार्थ:- वन रूपी प्रांतों में जो मुनियों के बहुत से निवास स्थान हैं, वही मानो शहरों, नगरों, गाँवों और खेड़ों का समूह है

अयोध्याकाण्ड दोहा 235

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चौपाई :सेवक बचन सत्य सब जाने। आश्रम निकट जाइ निअराने॥भरत दीख बन सैल समाजू। मुदित छुधित जनु पाइ सुनाजू॥1॥ भावार्थ:- भरतजी ने सेवक (गुह) के सब वचन सत्य जाने और वे आश्रम के समीप जा पहुँचे। वहाँ के वन और पर्वतों के समूह को देखा तो भरतजी 

अयोध्याकाण्ड दोहा 234

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चौपाई :जौं परिहरहिं मलिन मनु जानी। जौं सनमानहिं सेवकु मानी॥मोरें सरन रामहि की पनही। राम सुस्वामि दोसु सब जनही॥1॥ भावार्थ:- चाहे मलिन मन जानकर मुझे त्याग दें, चाहे अपना सेवक मानकर मेरा सम्मान करें, (कुछ भी करें), मेरे तो श्री रामचंद