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अयोध्याकाण्ड दोहा 249

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चौपाई :राम बचन सुनि सभय समाजू। जनु जलनिधि महुँ बिकल जहाजू॥सुनि गुर गिरा सुमंगल मूला। भयउ मनहुँ मारुत अनुकूला॥1॥ भावार्थ:- श्री रामजी के वचन सुनकर सारा समाज भयभीत हो गया। मानो बीच समुद्र में जहाज डगमगा गया हो, परन्तु जब उन्होंने ग

अयोध्याकाण्ड दोहा 248

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चौपाई :करि पितु क्रिया बेद जसि बरनी। भे पुनीत पातक तम तरनी॥जासु नाम पावक अघ तूला। सुमिरत सकल सुमंगल मूला॥1॥ भावार्थ:- वेदों में जैसा कहा गया है, उसी के अनुसार पिता की क्रिया करके, पाप रूपी अंधकार के नष्ट करने वाले सूर्यरूप श्री राम

अयोध्याकाण्ड दोहा 247

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चौपाई :बिकल सनेहँ सीय सब रानीं। बैठन सबहि कहेउ गुर ग्यानीं॥कहि जग गति मायिक मुनिनाथा॥ कहे कछुक परमारथ गाथा॥1॥ भावार्थ:- सीताजी और सब रानियाँ स्नेह के मारे व्याकुल हैं। तब ज्ञानी गुरु ने सबको बैठ जाने के लिए कहा। फिर मुनिनाथ वशिष

अयोध्याकाण्ड दोहा 246

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चौपाई :सीय आइ मुनिबर पग लागी। उचित असीस लही मन मागी॥गुरपतिनिहि मुनितियन्ह समेता। मिली पेमु कहि जाइ न जेता॥1॥ भावार्थ:- सीताजी आकर मुनि श्रेष्ठ वशिष्ठजी के चरणों लगीं और उन्होंने मन माँगी उचित आशीष पाई। फिर मुनियों की स्त्रियों 

अयोध्याकाण्ड दोहा 245

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चौपाई :गुरतिय पद बंदे दुहु भाईं। सहित बिप्रतिय जे सँग आईं॥गंग गौरिसम सब सनमानीं। देहिं असीस मुदित मृदु बानीं॥1॥ भावार्थ:- फिर दोनों भाइयों ने ब्राह्मणों की स्त्रियों सहित- जो भरतजी के साथ आई थीं, गुरुजी की पत्नी अरुंधतीजी के चरण

अयोध्याकाण्ड दोहा 244

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चौपाई :आरत लोग राम सबु जाना। करुनाकर सुजान भगवाना॥जो जेहि भायँ रहा अभिलाषी। तेहि तेहि कै तसि तसि रुख राखी॥1॥ भावार्थ:- दया की खान, सुजान भगवान श्री रामजी ने सब लोगों को दुःखी (मिलने के लिए व्याकुल) जाना। तब जो जिस भाव से मिलने का अभि

अयोध्याकाण्ड दोहा 243

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चौपाई :सीलसिंधु सुनि गुर आगवनू। सिय समीप राखे रिपुदवनू॥चले सबेग रामु तेहि काला। धीर धरम धुर दीनदयाला॥1॥ भावार्थ:- गुरु का आगमन सुनकर शील के समुद्र श्री रामचन्द्रजी ने सीताजी के पास शत्रुघ्नजी को रख दिया और वे परम धीर, धर्मधुरंध

अयोध्याकाण्ड दोहा 242

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चौपाई :भेंटेउ लखन ललकि लघु भाई। बहुरि निषादु लीन्ह उर लाई॥पुनि मुनिगन दुहुँ भाइन्ह बंदे। अभिमत आसिष पाइ अनंदे॥1॥ भावार्थ:- तब लक्ष्मणजी ललककर (बड़ी उमंग के साथ) छोटे भाई शत्रुघ्न से मिले। फिर उन्होंने निषादराज को हृदय से लगा लिया