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अयोध्याकाण्ड दोहा 306

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चौपाई :सहित समाज तुम्हार हमारा। घर बन गुर प्रसाद रखवारा॥मातु पिता गुर स्वामि निदेसू। सकल धरम धरनीधर सेसू॥1॥ भावार्थ:- गुरुजी का प्रसाद (अनुग्रह) ही घर में और वन में समाज सहित तुम्हारा और हमारा रक्षक है। माता, पिता, गुरु और स्वामी क

अयोध्याकाण्ड दोहा 305

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चौपाई :जानहु तात तरनि कुल रीती। सत्यसंध पितु कीरति प्रीती॥समउ समाजु लाज गुरजन की। उदासीन हित अनहित मन की॥1॥ भावार्थ:- हे तात! तुम सूर्यकुल की रीति को, सत्यप्रतिज्ञ पिताजी की कीर्ति और प्रीति को, समय, समाज और गुरुजनों की लज्जा (मर्य

अयोध्याकाण्ड दोहा 304

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चौपाई :भरत सुभाउ न सुगम निगमहूँ। लघु मति चापलता कबि छमहूँ॥कहत सुनत सति भाउ भरत को। सीय राम पद होइ न रत को॥1॥ भावार्थ:- भरतजी के स्वभाव का वर्णन वेदों के लिए भी सुगम नहीं है। (अतः) मेरी तुच्छ बुद्धि की चंचलता को कवि लोग क्षमा करें! भरत

अयोध्याकाण्ड दोहा 303

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चौपाई :कृपासिंधु लखि लोग दुखारे। निज सनेहँ सुरपति छल भारे॥सभा राउ गुर महिसुर मंत्री। भरत भगति सब कै मति जंत्री॥1॥ भावार्थ:- कृपासिंधु श्री रामचन्द्रजी ने लोगों को अपने स्नेह और देवराज इन्द्र के भारी छल से दुःखी देखा। सभा, राजा ज

अयोध्याकाण्ड दोहा 302

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चौपाई :कपट कुचालि सीवँ सुरराजू। पर अकाज प्रिय आपन काजू॥काक समान पाकरिपु रीती। छली मलीन कतहुँ न प्रतीती॥1॥ भावार्थ:- देवराज इन्द्र कपट और कुचाल की सीमा है। उसे पराई हानि और अपना लाभ ही प्रिय है। इन्द्र की रीति कौए के समान है। वह छल

अयोध्याकाण्ड दोहा 301

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चौपाई :प्रभु पद पदुम पराग दोहाई। सत्य सुकृत सुख सीवँ सुहाई॥सो करि कहउँ हिए अपने की। रुचि जागत सोवत सपने की॥1॥ भावार्थ:- प्रभु (आप) के चरणकमलों की रज, जो सत्य, सुकृत (पुण्य) और सुख की सुहावनी सीमा (अवधि) है, उसकी दुहाई करके मैं अपने हृदय 

अयोध्याकाण्ड दोहा 300

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चौपाई :सोक सनेहँ कि बाल सुभाएँ। आयउँ लाइ रजायसु बाएँ॥तबहुँ कृपाल हेरि निज ओरा। सबहि भाँति भल मानेउ मोरा॥1॥ भावार्थ:- मैं शोक से या स्नेह से या बालक स्वभाव से आज्ञा को बाएँ लाकर (न मानकर) चला आया, तो भी कृपालु स्वामी (आप) ने अपनी ओर देख

अयोध्याकाण्ड दोहा 299

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चौपाई :राउरि रीति सुबानि बड़ाई। जगत बिदित निगमागम गाई॥कूर कुटिल खल कुमति कलंकी। नीच निसील निरीस निसंकी॥1॥ भावार्थ:- हे नाथ! आपकी रीति और सुंदर स्वभाव की बड़ाई जगत में प्रसिद्ध है और वेद-शास्त्रों ने गाई है। जो क्रूर, कुटिल, दुष्ट, कु