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अयोध्याकाण्ड दोहा 298

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चौपाई :प्रभु पितु मातु सुहृद गुर स्वामी। पूज्य परम हित अंतरजामी॥सरल सुसाहिबु सील निधानू। प्रनतपाल सर्बग्य सुजानू॥1॥ भावार्थ:- हे प्रभु! आप पिता, माता, सुहृद् (मित्र), गुरु, स्वामी, पूज्य, परम हितैषी और अन्तर्यामी हैं। सरल हृदय, श्र

अयोध्याकाण्ड दोहा 296

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चौपाई :करि कुचालि सोचत सुरराजू। भरत हाथ सबु काजु अकाजू॥गए जनकु रघुनाथ समीपा। सनमाने सब रबिकुल दीपा॥1॥ भावार्थ:- कुचाल करके देवराज इन्द्र सोचने लगे कि काम का बनना-बिगड़ना सब भरतजी के हाथ है। इधर राजा जनकजी (मुनि वशिष्ठ आदि के साथ) श

अयोध्याकाण्ड दोहा 295

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चौपाई :सुरन्ह सुमिरि सारदा सराही। देबि देव सरनागत पाही॥फेरि भरत मति करि निज माया। पालु बिबुध कुल करि छल छाया॥1॥ भावार्थ:- देवताओं ने सरस्वती का स्मरण कर उनकी सराहना (स्तुति) की और कहा- हे देवी! देवता आपके शरणागत हैं, उनकी रक्षा कीज

अयोध्याकाण्ड दोहा 294

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चौपाई :भरत बचन सुनि देखि सुभाऊ। सहित समाज सराहत राऊ॥सुगम अगम मृदु मंजु कठोरे। अरथु अमित अति आखर थोरे॥1॥ भावार्थ:- भरतजी के वचन सुनकर और उनका स्वभाव देखकर समाज सहित राजा जनक उनकी सराहना करने लगे। भरतजी के वचन सुगम और अगम, सुंदर, कोम

अयोध्याकाण्ड दोहा 293

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चौपाई :सुनि तन पुलकि नयन भरि बारी। बोले भरतु धीर धरि भारी॥प्रभु प्रिय पूज्य पिता सम आपू। कुलगुरु सम हित माय न बापू॥1॥ भावार्थ:- भरतजी यह सुनकर पुलकित शरीर हो नेत्रों में जल भरकर बड़ा भारी धीरज धरकर बोले- हे प्रभो! आप हमारे पिता के सम

अयोध्याकाण्ड दोहा 292

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चौपाई :सुनि मुनि बचन जनक अनुरागे। लखि गति ग्यानु बिरागु बिरागे॥सिथिल सनेहँ गुनत मन माहीं। आए इहाँ कीन्ह भल नाहीं॥1॥ भावार्थ:- मुनि वशिष्ठजी के वचन सुनकर जनकजी प्रेम में मग्न हो गए। उनकी दशा देखकर ज्ञान और वैराग्य को भी वैराग्य ह

अयोध्याकाण्ड दोहा 291

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चौपाई :सो सुखु करमु धरमु जरि जाऊ। जहँ न राम पद पंकज भाऊ॥जोगु कुजोगु ग्यानु अग्यानू। जहँ नहिं राम प्रेम परधानू॥1॥ भावार्थ:- जहाँ श्री राम के चरण कमलों में प्रेम नहीं है, वह सुख, कर्म और धर्म जल जाए, जिसमें श्री राम प्रेम की प्रधानता न

अयोध्याकाण्ड दोहा 290

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चौपाई :राम भरत गुन गनत सप्रीती। निसि दंपतिहि पलक सम बीती॥राज समाज प्रात जुग जागे। न्हाइ न्हाइ सुर पूजन लागे॥1॥ भावार्थ:- श्री रामजी और भरतजी के गुणों की प्रेमपूर्वक गणना करते (कहते-सुनते) पति-पत्नी को रात पलक के समान बीत गई। प्रात