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अयोध्याकाण्ड दोहा 289

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चौपाई :अगम सबहि बरनत बरबरनी। जिमि जलहीन मीन गमु धरनी॥भरत अमित महिमा सुनु रानी। जानहिं रामु न सकहिं बखानी॥1॥ भावार्थ:- हे श्रेष्ठ वर्णवाली! भरतजी की महिमा का वर्णन करना सभी के लिए वैसे ही अगम है जैसे जलरहित पृथ्वी पर मछली का चलना। 

अयोध्याकाण्ड दोहा 288

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चौपाई :सुनि भूपाल भरत ब्यवहारू। सोन सुगंध सुधा ससि सारू॥मूदे सजन नयन पुलके तन। सुजसु सराहन लगे मुदित मन॥1॥ भावार्थ:- सोने में सुगंध और (समुद्र से निकली हुई) सुधा में चन्द्रमा के सार अमृत के समान भरतजी का व्यवहार सुनकर राजा ने (प्रे

अयोध्याकाण्ड दोहा 287

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चौपाई :तापस बेष जनक सिय देखी। भयउ पेमु परितोषु बिसेषी॥पुत्रि पबित्र किए कुल दोऊ। सुजस धवल जगु कह सबु कोऊ॥1॥ भावार्थ:- सीताजी को तपस्विनी वेष में देखकर जनकजी को विशेष प्रेम और संतोष हुआ। (उन्होंने कहा-) बेटी! तूने दोनों कुल पवित्र क

अयोध्याकाण्ड दोहा 286

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चौपाई :प्रिय परिजनहि मिली बैदेही। जो जेहि जोगु भाँति तेहि तेही॥तापस बेष जानकी देखी। भा सबु बिकल बिषाद बिसेषी॥1॥ भावार्थ:- जानकीजी अपने प्यारे कुटुम्बियों से- जो जिस योग्य था, उससे उसी प्रकार मिलीं। जानकीजी को तपस्विनी के वेष मे

अयोध्याकाण्ड दोहा 285

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चौपाई :लखि सनेह सुनि बचन बिनीता। जनकप्रिया गह पाय पुनीता॥देबि उचित असि बिनय तुम्हारी। दसरथ घरिनि राम महतारी॥1॥ भावार्थ:- कौसल्याजी के प्रेम को देखकर और उनके विनम्र वचनों को सुनकर जनकजी की प्रिय पत्नी ने उनके पवित्र चरण पकड़ लिए 

अयोध्याकाण्ड दोहा 284

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चौपाई :रानि राय सन अवसरु पाई। अपनी भाँति कहब समुझाई॥रखिअहिं लखनु भरतु गवनहिं बन। जौं यह मत मानै महीप मन॥1॥ भावार्थ:- हे रानी! मौका पाकर आप राजा को अपनी ओर से जहाँ तक हो सके समझाकर कहिएगा कि लक्ष्मण को घर रख लिया जाए और भरत वन को जाएँ

अयोध्याकाण्ड दोहा 283

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चौपाई :ईस प्रसाद असीस तुम्हारी। सुत सुतबधू देवसरि बारी॥राम सपथ मैं कीन्हि न काऊ। सो करि कहउँ सखी सति भाऊ॥1॥ भावार्थ:- ईश्वर के अनुग्रह और आपके आशीर्वाद से मेरे (चारों) पुत्र और (चारों) बहुएँ गंगाजी के जल के समान पवित्र हैं। हे सखी! म

अयोध्याकाण्ड दोहा 282

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चौपाई :सुनि ससोच कह देबि सुमित्रा। बिधि गति बड़ि बिपरीत बिचित्रा॥जो सृजि पालइ हरइ बहोरी। बालकेलि सम बिधि मति भोरी॥1॥ भावार्थ:- यह सुनकर देवी सुमित्राजी शोक के साथ कहने लगीं- विधाता की चाल बड़ी ही विपरीत और विचित्र है, जो सृष्टि को उ