अयोध्याकाण्ड दोहा 289
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चौपाई :अगम सबहि बरनत बरबरनी। जिमि जलहीन मीन गमु धरनी॥भरत अमित महिमा सुनु रानी। जानहिं रामु न सकहिं बखानी॥1॥ भावार्थ:- हे श्रेष्ठ वर्णवाली! भरतजी की महिमा का वर्णन करना सभी के लिए वैसे ही अगम है जैसे जलरहित पृथ्वी पर मछली का चलना।