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अयोध्याकाण्ड दोहा 281

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चौपाई :एहि बिधि सकल मनोरथ करहीं। बचन सप्रेम सुनत मन हरहीं॥सीय मातु तेहि समय पठाईं। दासीं देखि सुअवसरु आईं॥1॥ भावार्थ:- इस प्रकार सब मनोरथ कर रहे हैं। उनके प्रेमयुक्त वचन सुनते ही (सुनने वालों के) मनों को हर लेते हैं। उसी समय सीताज

अयोध्याकाण्ड दोहा 280

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चौपाई :एहि बिधि बासर बीते चारी। रामु निरखि नर नारि सुखारी॥दुहु समाज असि रुचि मन माहीं। बिनु सिय राम फिरब भल नाहीं॥1॥ भावार्थ:- इस प्रकार चार दिन बीत गए। श्री रामचन्द्रजी को देखकर सभी नर-नारी सुखी हैं। दोनों समाजों के मन में ऐसी इच

अयोध्याकाण्ड दोहा 279

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चौपाई :कामद भे गिरि राम प्रसादा। अवलोकत अपहरत बिषादा॥सर सरिता बन भूमि बिभागा। जनु उमगत आनँद अनुरागा॥1॥ भावार्थ:- श्री रामचन्द्रजी की कृपा से सब पर्वत मनचाही वस्तु देने वाले हो गए। वे देखने मात्र से ही दुःखों को सर्वथा हर लेते थे

अयोध्याकाण्ड दोहा 278

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चौपाई :जे महिसुर दसरथ पुर बासी। जे मिथिलापति नगर निवासी॥हंस बंस गुर जनक पुरोधा। जिन्ह जग मगु परमारथु सोधा॥1॥ भावार्थ:- जो दशरथजी की नगरी अयोध्या के रहने वाले और जो मिथिलापति जनकजी के नगर जनकपुर के रहने वाले ब्राह्मण थे तथा सूर्य

अयोध्याकाण्ड दोहा 277

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चौपाई :जासु ग्यान रबि भव निसि नासा। बचन किरन मुनि कमल बिकासा॥तेहि कि मोह ममता निअराई। यह सिय राम सनेह बड़ाई॥1॥ भावार्थ:- जिन राजा जनक का ज्ञान रूपी सूर्य भव (आवागमन) रूपी रात्रि का नाश कर देता है और जिनकी वचन रूपी किरणें मुनि रूपी कम

अयोध्याकाण्ड दोहा 276

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चौपाई :बोरति ग्यान बिराग करारे। बचन ससोक मिलत नद नारे॥सोच उसास समीर तरंगा। धीरज तट तरुबर कर भंगा॥1॥ भावार्थ:- यह करुणा की नदी (इतनी बढ़ी हुई है कि) ज्ञान-वैराग्य रूपी किनारों को डुबाती जाती है। शोक भरे वचन नद और नाले हैं, जो इस नदी मे

अयोध्याकाण्ड दोहा 275

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चौपाई :भाइ सचिव गुर पुरजन साथा। आगें गवनु कीन्ह रघुनाथा॥गिरिबरु दीख जनकपति जबहीं। करि प्रनामु रथ त्यागेउ तबहीं॥1॥ भावार्थ:- भाई, मंत्री, गुरु और पुरवासियों को साथ लेकर श्री रघुनाथजी आगे (जनकजी की अगवानी में) चले। जनकजी ने ज्यों ह

अयोध्याकाण्ड दोहा 274

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चौपाई :सुनि सनेहमय पुरजन बानी। निंदहिं जोग बिरति मुनि ग्यानी॥एहि बिधि नित्यकरम करि पुरजन। रामहि करहिं प्रनाम पुलकि तन॥1॥ भावार्थ:- अयोध्या वासियों की प्रेममयी वाणी सुनकर ज्ञानी मुनि भी अपने योग और वैराग्य की निंदा करते हैं। अ