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अयोध्याकाण्ड दोहा 273

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चौपाई :गरइ गलानि कुटिल कैकेई। काहि कहै केहि दूषनु देई॥अस मन आनि मुदित नर नारी। भयउ बहोरि रहब दिन चारी॥1॥ भावार्थ:- कुटिल कैकेयी मन ही मन ग्लानि (पश्चाताप) से गली जाती है। किससे कहे और किसको दोष दे? और सब नर-नारी मन में ऐसा विचार कर प्

अयोध्याकाण्ड दोहा 272

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चौपाई :दूतन्ह आइ भरत कइ करनी। जनक समाज जथामति बरनी॥सुनि गुर परिजन सचिव महीपति। भे सब सोच सनेहँ बिकल अति॥1॥ भावार्थ:- (गुप्त) दूतों ने आकर राजा जनकजी की सभा में भरतजी की करनी का अपनी बुद्धि के अनुसार वर्णन किया। उसे सुनकर गुरु, कुटु

अयोध्याकाण्ड दोहा 271

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चौपाई :कोसलपति गति सुनि जनकौरा। भे सब लोक सोकबस बौरा॥जेहिं देखे तेहि समय बिदेहू। नामु सत्य अस लाग न केहू॥1॥ भावार्थ:- अयोध्यानाथ की गति (दशरथजी का मरण) सुनकर जनकपुर वासी सभी लोग शोकवश बावले हो गए (सुध-बुध भूल गए)। उस समय जिन्होंने व

अयोध्याकाण्ड दोहा 270

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चौपाई :भरत बचन सुचि सुनि सुर हरषे। साधु सराहि सुमन सुर बरषे॥असमंजस बस अवध नेवासी। प्रमुदित मन तापस बनबासी॥1॥ भावार्थ:- भरतजी के पवित्र वचन सुनकर देवता हर्षित हुए और ‘साधु-साधु’ कहकर सराहना करते हुए देवताओं ने फूल बरसाए। अयोध्या

अयोध्याकाण्ड दोहा 269

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चौपाई :नतरु जाहिं बन तीनिउ भाई। बहुरिअ सीय सहित रघुराई॥जेहि बिधि प्रभु प्रसन्न मन होई। करुना सागर कीजिअ सोई॥1॥ भावार्थ:- अथवा हम तीनों भाई वन चले जाएँ और हे श्री रघुनाथजी! आप श्री सीताजी सहित (अयोध्या को) लौट जाइए। हे दयासागर! जिस 

अयोध्याकाण्ड दोहा 268

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चौपाई :लखि सब बिधि गुर स्वामि सनेहू। मिटेउ छोभु नहिं मन संदेहू॥अब करुनाकर कीजिअ सोई। जन हित प्रभु चित छोभु न होई॥1॥ भावार्थ:- गुरु और स्वामी का सब प्रकार से स्नेह देखकर मेरा क्षोभ मिट गया, मन में कुछ भी संदेह नहीं रहा। हे दया की खान!

अयोध्याकाण्ड दोहा 267

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चौपाई :कहौं कहावौं का अब स्वामी। कृपा अंबुनिधि अंतरजामी॥गुर प्रसन्न साहिब अनुकूला। मिटी मलिन मन कलपित सूला॥1॥ भावार्थ:- हे स्वामी! हे कृपा के समुद्र! हे अन्तर्यामी! अब मैं (अधिक) क्या कहूँ और क्या कहाऊँ? गुरु महाराज को प्रसन्न और स

अयोध्याकाण्ड दोहा 266

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चौपाई :सीतापति सेवक सेवकाई। कामधेनु सय सरिस सुहाई॥भरत भगति तुम्हरें मन आई। तजहु सोचु बिधि बात बनाई॥1॥ भावार्थ:- सीतानाथ श्री रामजी के सेवक की सेवा सैकड़ों कामधेनुओं के समान सुंदर है। तुम्हारे मन में भरतजी की भक्ति आई है, तो अब सोच