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बालकांड दोहा 131

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चौपाई :देखि रूप मुनि बिरति बिसारी। बड़ी बार लगि रहे निहारी॥लच्छन तासु बिलोकि भुलाने। हृदयँ हरष नहिं प्रगट बखाने॥1॥भावार्थ:- उसके रूप को देखकर मुनि वैराग्य भूल गए और बड़ी देर तक उसकी ओर देखते ही रह गए। उसके लक्षण देखकर मुनि अपने आपको 

बालकांड दोहा 130

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चौपाई :बसहिं नगर सुंदर नर नारी। जनु बहु मनसिज रति तनुधारी॥तेहिं पुर बसइ सीलनिधि राजा। अगनित हय गय सेन समाजा॥1॥भावार्थ:- उस नगर में ऐसे सुंदर नर-नारी बसते थे, मानो बहुत से कामदेव और (उसकी स्त्री) रति ही मनुष्य शरीर धारण किए हुए हों। उस

बालकांड दोहा 129

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चौपाई :सुनु मुनि मोह होइ मन ताकें। ग्यान बिराग हृदय नहिं जाकें॥ब्रह्मचरज ब्रत रत मतिधीरा। तुम्हहि कि करइ मनोभव पीरा॥1॥भावार्थ:- हे मुनि! सुनिए, मोह तो उसके मन में होता है, जिसके हृदय में ज्ञान-वैराग्य नहीं है। आप तो ब्रह्मचर्यव्रत 

बालकांड दोहा 128

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चौपाई :राम कीन्ह चाहहिं सोइ होई। करै अन्यथा अस नहिं कोई॥संभु बचन मुनि मन नहिं भाए। तब बिरंचि के लोक सिधाए॥1॥भावार्थ:- श्री रामचन्द्रजी जो करना चाहते हैं, वही होता है, ऐसा कोई नहीं जो उसके विरुद्ध कर सके। श्री शिवजी के वचन नारदजी के म

बालकांड दोहा 127

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चौपाई :भयउ न नारद मन कछु रोषा। कहि प्रिय बचन काम परितोषा॥नाइ चरन सिरु आयसु पाई। गयउ मदन तब सहित सहाई॥1॥भावार्थ:- नारदजी के मन में कुछ भी क्रोध न आया। उन्होंने प्रिय वचन कहकर कामदेव का समाधान किया। तब मुनि के चरणों में सिर नवाकर और उन

बालकांड दोहा 126

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चौपाई :तेहि आश्रमहिं मदन जब गयऊ। निज मायाँ बसंत निरमयऊ॥कुसुमित बिबिध बिटप बहुरंगा। कूजहिं कोकिल गुंजहिं भृंगा॥1॥भावार्थ:- जब कामदेव उस आश्रम में गया, तब उसने अपनी माया से वहाँ वसन्त ऋतु को उत्पन्न किया। तरह-तरह के वृक्षों पर रंग-ब

बालकांड दोहा 125

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चौपाई :हिमगिरि गुहा एक अति पावनि। बह समीप सुरसरी सुहावनि॥आश्रम परम पुनीत सुहावा। देखि देवरिषि मन अति भावा॥1॥भावार्थ:- हिमालय पर्वत में एक बड़ी पवित्र गुफा थी। उसके समीप ही सुंदर गंगाजी बहती थीं। वह परम पवित्र सुंदर आश्रम देखने पर 

बालकांड दोहा 124

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चौपाई :तासु श्राप हरि दीन्ह प्रमाना। कौतुकनिधि कृपाल भगवाना॥तहाँ जलंधर रावन भयऊ। रन हति राम परम पद दयऊ॥1॥भावार्थ:- लीलाओं के भंडार कृपालु हरि ने उस स्त्री के शाप को प्रामाण्य दिया (स्वीकार किया)। वही जलन्धर उस कल्प में रावण हुआ, जि