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बालकांड दोहा 139

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चौपाई :हर गन मुनिहि जात पथ देखी। बिगत मोह मन हरष बिसेषी॥अति सभीत नारद पहिं आए। गहि पद आरत बचन सुहाए॥1॥भावार्थ:- शिवजी के गणों ने जब मुनि को मोहरहित और मन में बहुत प्रसन्न होकर मार्ग में जाते हुए देखा तब वे अत्यन्त भयभीत होकर नारदजी क

बालकांड दोहा 138

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चौपाई :जब हरि माया दूरि निवारी। नहिं तहँ रमा न राजकुमारी॥तब मुनि अति सभीत हरि चरना। गहे पाहि प्रनतारति हरना॥1॥भावार्थ:- जब भगवान ने अपनी माया को हटा लिया, तब वहाँ न लक्ष्मी ही रह गईं, न राजकुमारी ही। तब मुनि ने अत्यन्त भयभीत होकर श्र

बालकांड दोहा 137

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चौपाई :परम स्वतंत्र न सिर पर कोई। भावइ मनहि करहु तुम्ह सोई॥भलेहि मंद मंदेहि भल करहू। बिसमय हरष न हियँ कछु धरहू॥1॥भावार्थ:- तुम परम स्वतंत्र हो, सिर पर तो कोई है नहीं, इससे जब जो मन को भाता है, (स्वच्छन्दता से) वही करते हो। भले को बुरा और 

बालकांड दोहा 136

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चौपाई :पुनि जल दीख रूप निज पावा। तदपि हृदयँ संतोष न आवा॥फरकत अधर कोप मन माहीं। सपदि चले कमलापति पाहीं॥1॥भावार्थ:- मुनि ने फिर जल में देखा, तो उन्हें अपना (असली) रूप प्राप्त हो गया, तब भी उन्हें संतोष नहीं हुआ। उनके होठ फड़क रहे थे और मन 

बालकांड दोहा 135

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चौपाई :जेहि दिसि बैठे नारद फूली। सो दिसि तेहिं न बिलोकी भूली॥पुनि-पुनि मुनि उकसहिं अकुलाहीं। देखि दसा हर गन मुसुकाहीं॥1॥भावार्थ:- जिस ओर नारदजी (रूप के गर्व में) फूले बैठे थे, उस ओर उसने भूलकर भी नहीं ताका। नारद मुनि बार-बार उचकते और 

बालकांड दोहा 134

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चौपाई :जेहिं समाज बैठे मुनि जाई। हृदयँ रूप अहमिति अधिकाई॥तहँ बैठे महेस गन दोऊ। बिप्रबेष गति लखइ न कोऊ॥1॥भावार्थ:- नारदजी अपने हृदय में रूप का बड़ा अभिमान लेकर जिस समाज (पंक्ति) में जाकर बैठे थे, ये शिवजी के दोनों गण भी वहीं बैठ गए। ब्र

बालकांड दोहा 133

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चौपाई :कुपथ माग रुज ब्याकुल रोगी। बैद न देइ सुनहु मुनि जोगी॥एहि बिधि हित तुम्हार मैं ठयऊ। कहि अस अंतरहित प्रभु भयऊ॥1॥भावार्थ:- हे योगी मुनि! सुनिए, रोग से व्याकुल रोगी कुपथ्य माँगे तो वैद्य उसे नहीं देता। इसी प्रकार मैंने भी तुम्हा

बालकांड दोहा 132

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चौपाई :हरि सन मागौं सुंदरताई। होइहि जात गहरु अति भाई॥मोरें हित हरि सम नहिं कोऊ। एहि अवसर सहाय सोइ होऊ॥1॥भावार्थ:- (एक काम करूँ कि) भगवान से सुंदरता माँगूँ, पर भाई! उनके पास जाने में तो बहुत देर हो जाएगी, किन्तु श्री हरि के समान मेरा हित