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बालकांड दोहा 99

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चौपाई :तब मयना हिमवंतु अनंदे। पुनि पुनि पारबती पद बंदे॥नारि पुरुष सिसु जुबा सयाने। नगर लोग सब अति हरषाने॥1॥भावार्थ:- तब मैना और हिमवान आनंद में मग्न हो गए और उन्होंने बार-बार पार्वती के चरणों की वंदना की। स्त्री, पुरुष, बालक, युवा औ

बालकांड दोहा 98

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चौपाई :तब नारद सबही समुझावा। पूरुब कथा प्रसंगु सुनावा॥मयना सत्य सुनहु मम बानी। जगदंबा तव सुता भवानी॥1॥भावार्थ:- तब नारदजी ने पूर्वजन्म की कथा सुनाकर सबको समझाया (और कहा) कि हे मैना! तुम मेरी सच्ची बात सुनो, तुम्हारी यह लड़की साक्षा

बालकांड दोहा 97

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चौपाई :नारद कर मैं काह बिगारा। भवनु मोर जिन्ह बसत उजारा॥अस उपदेसु उमहि जिन्ह दीन्हा। बौरे बरहि लागि तपु कीन्हा॥1॥भावार्थ:- मैंने नारद का क्या बिगाड़ा था, जिन्होंने मेरा बसता हुआ घर उजाड़ दिया और जिन्होंने पार्वती को ऐसा उपदेश दिय

बालकांड दोहा 96

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चौपाई :लै अगवान बरातहि आए। दिए सबहि जनवास सुहाए॥मैनाँ सुभ आरती सँवारी। संग सुमंगल गावहिं नारी॥1॥भावार्थ:- अगवान लोग बारात को लिवा लाए, उन्होंने सबको सुंदर जनवासे ठहरने को दिए। मैना (पार्वतीजी की माता) ने शुभ आरती सजाई और उनके साथ क

बालकांड दोहा 95

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चौपाई :नगर निकट बरात सुनि आई। पुर खरभरु सोभा अधिकाई॥करि बनाव सजि बाहन नाना। चले लेन सादर अगवाना॥1॥भावार्थ:- बारात को नगर के निकट आई सुनकर नगर में चहल-पहल मच गई, जिससे उसकी शोभा बढ़ गई। अगवानी करने वाले लोग बनाव-श्रृंगार करके तथा नान

बालकांड दोहा 94

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चौपाई :जस दूलहु तसि बनी बराता। कौतुक बिबिध होहिं मग जाता॥इहाँ हिमाचल रचेउ बिताना। अति बिचित्र नहिं जाइ बखाना॥1॥भावार्थ:- जैसा दूल्हा है, अब वैसी ही बारात बन गई है। मार्ग में चलते हुए भाँति-भाँति के कौतुक (तमाशे) होते जाते हैं। इधर ह

बालकांड दोहा 93

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चौपाई :बर अनुहारि बरात न भाई। हँसी करैहहु पर पुर जाई॥बिष्नु बचन सुनि सुर मुसुकाने। निज निज सेन सहित बिलगाने॥1॥भावार्थ:- हे भाई! हम लोगों की यह बारात वर के योग्य नहीं है। क्या पराए नगर में जाकर हँसी कराओगे? विष्णु भगवान की बात सुनकर द

बालकांड दोहा 92

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चौपाई :सिवहि संभु गन करहिं सिंगारा। जटा मुकुट अहि मौरु सँवारा॥कुंडल कंकन पहिरे ब्याला। तन बिभूति पट केहरि छाला॥1॥भावार्थ:- शिवजी के गण शिवजी का श्रृंगार करने लगे। जटाओं का मुकुट बनाकर उस पर साँपों का मौर सजाया गया। शिवजी ने साँपो