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बालकांड दोहा 123

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चौपाई :मुकुत न भए हते भगवाना। तीनि जनम द्विज बचन प्रवाना॥एक बार तिन्ह के हित लागी। धरेउ सरीर भगत अनुरागी॥1॥भावार्थ:- भगवान के द्वारा मारे जाने पर भी वे (हिरण्याक्ष और हिरण्यकशिपु) इसीलिए मुक्त नहीं हुए कि ब्राह्मण के वचन (शाप) का प्

बालकांड दोहा 122

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चौपाई :सोइ जस गाइ भगत भव तरहीं। कृपासिंधु जन हित तनु धरहीं॥राम जनम के हेतु अनेका। परम बिचित्र एक तें एका॥1॥भावार्थ:- उसी यश को गा-गाकर भक्तजन भवसागर से तर जाते हैं। कृपासागर भगवान भक्तों के हित के लिए शरीर धारण करते हैं। श्री रामचन्

बालकांड दोहा 121

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चौपाई :सुनु गिरिजा हरिचरित सुहाए। बिपुल बिसद निगमागम गाए॥हरि अवतार हेतु जेहि होई। इदमित्थं कहि जाइ न सोई॥1॥भावार्थ:- हे पार्वती! सुनो, वेद-शास्त्रों ने श्री हरि के सुंदर, विस्तृत और निर्मल चरित्रों का गान किया है। हरि का अवतार जिस 

बालकांड दोहा 120

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चौपाई :ससि कर सम सुनि गिरा तुम्हारी। मिटा मोह सरदातप भारी॥तुम्ह कृपाल सबु संसउ हरेऊ। राम स्वरूप जानि मोहि परेऊ॥1॥भावार्थ:- आपकी चन्द्रमा की किरणों के समान शीतल वाणी सुनकर मेरा अज्ञान रूपी शरद-ऋतु (क्वार) की धूप का भारी ताप मिट गया। 

बालकांड दोहा 119

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चौपाई :कासीं मरत जंतु अवलोकी। जासु नाम बल करउँ बिसोकी॥सोइ प्रभु मोर चराचर स्वामी। रघुबर सब उर अंतरजामी॥1॥भावार्थ:- (हे पार्वती !) जिनके नाम के बल से काशी में मरते हुए प्राणी को देखकर मैं उसे (राम मंत्र देकर) शोकरहित कर देता हूँ (मुक्त 

बालकांड दोहा 118

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चौपाई :एहि बिधि जग हरि आश्रित रहई। जदपि असत्य देत दुख अहई॥जौं सपनें सिर काटै कोई। बिनु जागें न दूरि दुख होई॥1॥भावार्थ:- इसी तरह यह संसार भगवान के आश्रित रहता है। यद्यपि यह असत्य है, तो भी दुःख तो देता ही है, जिस तरह स्वप्न में कोई सिर क

बालकांड दोहा 117

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चौपाई :निज भ्रम नहिं समुझहिं अग्यानी। प्रभु पर मोह धरहिं जड़ प्रानी॥जथा गगन घन पटल निहारी। झाँपेउ भानु कहहिं कुबिचारी॥1॥भावार्थ:- अज्ञानी मनुष्य अपने भ्रम को तो समझते नहीं और वे मूर्ख प्रभु श्री रामचन्द्रजी पर उसका आरोप करते हैं, 

बालकांड दोहा 116

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चौपाई :सगुनहि अगुनहि नहिं कछु भेदा। गावहिं मुनि पुरान बुध बेदा॥अगुन अरूप अलख अज जोई। भगत प्रेम बस सगुन सो होई॥1॥भावार्थ:- सगुण और निर्गुण में कुछ भी भेद नहीं है- मुनि, पुराण, पण्डित और वेद सभी ऐसा कहते हैं। जो निर्गुण, अरूप (निराकार), अ