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बालकांड दोहा 115

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चौपाई :अग्य अकोबिद अंध अभागी। काई बिषय मुकुर मन लागी॥लंपट कपटी कुटिल बिसेषी। सपनेहुँ संतसभा नहिं देखी॥1॥भावार्थ:- जो अज्ञानी, मूर्ख, अंधे और भाग्यहीन हैं और जिनके मन रूपी दर्पण पर विषय रूपी काई जमी हुई है, जो व्यभिचारी, छली और बड़े क

बालकांड दोहा 114

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चौपाई :रामकथा सुंदर कर तारी। संसय बिहग उड़ावनिहारी॥रामकथा कलि बिटप कुठारी। सादर सुनु गिरिराजकुमारी॥1॥भावार्थ:- श्री रामचन्द्रजी की कथा हाथ की सुंदर ताली है, जो संदेह रूपी पक्षियों को उड़ा देती है। फिर रामकथा कलियुग रूपी वृक्ष को क

बालकांड दोहा 113

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चौपाई :तदपि असंका कीन्हिहु सोई। कहत सुनत सब कर हित होई॥जिन्ह हरिकथा सुनी नहिं काना। श्रवन रंध्र अहिभवन समाना॥1॥भावार्थ:- फिर भी तुमने इसीलिए वही (पुरानी) शंका की है कि इस प्रसंग के कहने-सुनने से सबका कल्याण होगा। जिन्होंने अपने का

बालकांड दोहा 112

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चौपाई :झूठेउ सत्य जाहि बिनु जानें। जिमि भुजंग बिनु रजु पहिचानें॥जेहि जानें जग जाइ हेराई। जागें जथा सपन भ्रम जाई॥1॥भावार्थ:- जिसके बिना जाने झूठ भी सत्य मालूम होता है, जैसे बिना पहचाने रस्सी में साँप का भ्रम हो जाता है और जिसके जान ल

बालकांड दोहा 111

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चौपाई :पुनि प्रभु कहहु सो तत्त्व बखानी। जेहिं बिग्यान मगन मुनि ग्यानी॥भगति ग्यान बिग्यान बिरागा। पुनि सब बरनहु सहित बिभागा॥1॥भावार्थ:- हे प्रभु! फिर आप उस तत्त्व को समझाकर कहिए, जिसकी अनुभूति में ज्ञानी मुनिगण सदा मग्न रहते हैं औ

बालकांड दोहा 110

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चौपाई :जदपि जोषिता नहिं अधिकारी। दासी मन क्रम बचन तुम्हारी॥गूढ़उ तत्त्व न साधु दुरावहिं। आरत अधिकारी जहँ पावहिं॥1॥भावार्थ:- यद्यपि स्त्री होने के कारण मैं उसे सुनने की अधिकारिणी नहीं हूँ, तथापि मैं मन, वचन और कर्म से आपकी दासी हूँ।

बालकांड दोहा 109

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चौपाई :जौं अनीह ब्यापक बिभु कोऊ। कहहु बुझाइ नाथ मोहि सोऊ॥अग्य जानि रिस उर जनि धरहू। जेहि बिधि मोह मिटै सोइ करहू॥1॥भावार्थ:- यदि इच्छारहित, व्यापक, समर्थ ब्रह्म कोई और हैं, तो हे नाथ! मुझे उसे समझाकर कहिए। मुझे नादान समझकर मन में क्रो

बालकांड दोहा 108

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चौपाई :जौं मो पर प्रसन्न सुखरासी। जानिअ सत्य मोहि निज दासी॥तौ प्रभु हरहु मोर अग्याना। कहि रघुनाथ कथा बिधि नाना॥1॥भावार्थ:- हे सुख की राशि ! यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं और सचमुच मुझे अपनी दासी (या अपनी सच्ची दासी) जानते हैं, तो हे प्रभो! आ