बालकांड दोहा 107
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चौपाई :बैठे सोह कामरिपु कैसें। धरें सरीरु सांतरसु जैसें॥पारबती भल अवसरु जानी। गईं संभु पहिं मातु भवानी॥1॥भावार्थ:- कामदेव के शत्रु शिवजी वहाँ बैठे हुए ऐसे शोभित हो रहे थे, मानो शांतरस ही शरीर धारण किए बैठा हो। अच्छा मौका जानकर शिव