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बालकांड दोहा 147

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चौपाई :सरद मयंक बदन छबि सींवा। चारु कपोल चिबुक दर ग्रीवा॥अधर अरुन रद सुंदर नासा। बिधु कर निकर बिनिंदक हासा॥1॥भावार्थ:- उनका मुख शरद (पूर्णिमा) के चन्द्रमा के समान छबि की सीमास्वरूप था। गाल और ठोड़ी बहुत सुंदर थे, गला शंख के समान (त्रि

बालकांड दोहा 146

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चौपाई :सुनु सेवक सुरतरु सुरधेनू। बिधि हरि हर बंदित पद रेनू॥सेवत सुलभ सकल सुखदायक। प्रनतपाल सचराचर नायक॥1॥भावार्थ:- हे प्रभो! सुनिए, आप सेवकों के लिए कल्पवृक्ष और कामधेनु हैं। आपके चरण रज की ब्रह्मा, विष्णु और शिवजी भी वंदना करते ह

बालकांड दोहा 145

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चौपाई :बरष सहस दस त्यागेउ सोऊ। ठाढ़े रहे एक पद दोऊ ॥बिधि हरि हर तप देखि अपारा। मनु समीप आए बहु बारा॥1॥भावार्थ:- दस हजार वर्ष तक उन्होंने वायु का आधार भी छोड़ दिया। दोनों एक पैर से खड़े रहे। उनका अपार तप देखकर ब्रह्मा, विष्णु और शिवजी कई ब

बालकांड दोहा 144

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चौपाई :करहिं अहार साक फल कंदा। सुमिरहिं ब्रह्म सच्चिदानंदा॥पुनि हरि हेतु करन तप लागे। बारि अधार मूल फल त्यागे॥1॥भावार्थ:- वे साग, फल और कन्द का आहार करते थे और सच्चिदानंद ब्रह्म का स्मरण करते थे। फिर वे श्री हरि के लिए तप करने लगे औ

बालकांड दोहा 143

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चौपाई :बरबस राज सुतहि तब दीन्हा। नारि समेत गवन बन कीन्हा॥तीरथ बर नैमिष बिख्याता। अति पुनीत साधक सिधि दाता॥1॥भावार्थ:- तब मनुजी ने अपने पुत्र को जबर्दस्ती राज्य देकर स्वयं स्त्री सहित वन को गमन किया। अत्यन्त पवित्र और साधकों को सि

बालकांड दोहा 142

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चौपाई :स्वायंभू मनु अरु सतरूपा। जिन्ह तें भै नरसृष्टि अनूपा॥दंपति धरम आचरन नीका। अजहुँ गाव श्रुति जिन्ह कै लीका॥1॥भावार्थ:- स्वायम्भुव मनु और (उनकी पत्नी) शतरूपा, जिनसे मनुष्यों की यह अनुपम सृष्टि हुई, इन दोनों पति-पत्नी के धर्म औ

बालकांड दोहा 141

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चौपाई :अपर हेतु सुनु सैलकुमारी। कहउँ बिचित्र कथा बिस्तारी॥जेहि कारन अज अगुन अरूपा। ब्रह्म भयउ कोसलपुर भूपा॥1॥भावार्थ:- हे गिरिराजकुमारी! अब भगवान के अवतार का वह दूसरा कारण सुनो- मैं उसकी विचित्र कथा विस्तार करके कहता हूँ- जिस कार

बालकांड दोहा 140

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चौपाई :एहि बिधि जनम करम हरि केरे। सुंदर सुखद बिचित्र घनेरे॥कलप कलप प्रति प्रभु अवतरहीं। चारु चरित नानाबिधि करहीं॥1॥भावार्थ:- इस प्रकार भगवान के अनेक सुंदर, सुखदायक और अलौकिक जन्म और कर्म हैं। प्रत्येक कल्प में जब-जब भगवान अवतार ल