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बालकांड दोहा 187

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चौपाई :जनि डरपहु मुनि सिद्ध सुरेसा। तुम्हहि लागि धरिहउँ नर बेसा॥अंसन्ह सहित मनुज अवतारा। लेहउँ दिनकर बंस उदारा॥1॥भावार्थ:- हे मुनि, सिद्ध और देवताओं के स्वामियों! डरो मत। तुम्हारे लिए मैं मनुष्य का रूप धारण करूँगा और उदार (पवित्र)

बालकांड दोहा 186

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छन्द :जय जय सुरनायक जन सुखदायक प्रनतपाल भगवंता।गो द्विज हितकारी जय असुरारी सिंधुसुता प्रिय कंता॥पालन सुर धरनी अद्भुत करनी मरम न जानइ कोई।जो सहज कृपाला दीनदयाला करउ अनुग्रह सोई॥1॥भावार्थ:- हे देवताओं के स्वामी, सेवकों को सुख देन

बालकांड दोहा 185

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चौपाई :बैठे सुर सब करहिं बिचारा। कहँ पाइअ प्रभु करिअ पुकारा॥पुर बैकुंठ जान कह कोई। कोउ कह पयनिधि बस प्रभु सोई॥1॥भावार्थ:- सब देवता बैठकर विचार करने लगे कि प्रभु को कहाँ पावें ताकि उनके सामने पुकार (फरियाद) करें। कोई बैकुंठपुरी जान

बालकांड दोहा 184

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चौपाई :बाढ़े खल बहु चोर जुआरा। जे लंपट परधन परदारा॥मानहिं मातु पिता नहिं देवा। साधुन्ह सन करवावहिं सेवा॥1॥भावार्थ:- पराए धन और पराई स्त्री पर मन चलाने वाले, दुष्ट, चोर और जुआरी बहुत बढ़ गए। लोग माता-पिता और देवताओं को नहीं मानते थे और 

बालकांड दोहा 183

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चौपाई :इंद्रजीत सन जो कछु कहेऊ। सो सब जनु पहिलेहिं करि रहेऊ॥प्रथमहिं जिन्ह कहुँ आयसु दीन्हा। तिन्ह कर चरित सुनहु जो कीन्हा॥1॥भावार्थ:- मेघनाद से उसने जो कुछ कहा, उसे उसने (मेघनाद ने) मानो पहले से ही कर रखा था (अर्थात्‌ रावण के कहने भर

बालकांड दोहा 182

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चौपाई :मेघनाद कहूँ पुनि हँकरावा। दीन्हीं सिख बलु बयरु बढ़ावा॥जे सुर समर धीर बलवाना। जिन्ह कें लरिबे कर अभिमाना॥1॥भावार्थ:- फिर उसने मेघनाद को बुलवाया और सिखा-पढ़ाकर उसके बल और देवताओं के प्रति बैरभाव को उत्तेजना दी। (फिर कहा-) हे पुत

बालकांड दोहा 181

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चौपाई :कामरूप जानहिं सब माया। सपनेहुँ जिन्ह कें धरम न दाया॥दसमुख बैठ सभाँ एक बारा। देखि अमित आपन परिवारा॥1॥भावार्थ:- सभी राक्षस मनमाना रूप बना सकते थे और (आसुरी) माया जानते थे। उनके दया-धर्म स्वप्न में भी नहीं था। एक बार सभा में बैठ

बालकांड दोहा 180

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चौपाई :सुख संपति सुत सेन सहाई। जय प्रताप बल बुद्धि बड़ाई॥नित नूतन सब बाढ़त जाई। जिमि प्रतिलाभ लोभ अधिकाई॥1॥भावार्थ:- सुख, सम्पत्ति, पुत्र, सेना, सहायक, जय, प्रताप, बल, बुद्धि और बड़ाई- ये सब उसके नित्य नए (वैसे ही) बढ़ते जाते थे, जैसे प्रत्ये