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बालकांड दोहा 243

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चौपाई :सहज मनोहर मूरति दोऊ। कोटि काम उपमा लघु सोऊ॥सरद चंद निंदक मुख नीके। नीरज नयन भावते जी के॥1॥भावार्थ:- दोनों मूर्तियाँ स्वभाव से ही (बिना किसी बनाव-श्रृंगार के) मन को हरने वाली हैं। करोड़ों कामदेवों की उपमा भी उनके लिए तुच्छ है। 

बालकांड दोहा 242

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चौपाई :बिदुषन्ह प्रभु बिराटमय दीसा। बहु मुख कर पग लोचन सीसा॥जनक जाति अवलोकहिं कैसें। सजन सगे प्रिय लागहिं जैसें॥1॥भावार्थ:- विद्वानों को प्रभु विराट रूप में दिखाई दिए, जिसके बहुत से मुँह, हाथ, पैर, नेत्र और सिर हैं। जनकजी के सजातीय 

बालकांड दोहा 241

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चौपाई :राजकुअँर तेहि अवसर आए। मनहुँ मनोहरता तन छाए॥गुन सागर नागर बर बीरा। सुंदर स्यामल गौर सरीरा॥1॥भावार्थ:- उसी समय राजकुमार (राम और लक्ष्मण) वहाँ आए। (वे ऐसे सुंदर हैं) मानो साक्षात मनोहरता ही उनके शरीरों पर छा रही हो। सुंदर साँवल

बालकांड दोहा 240

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चौपाई :सीय स्वयंबरू देखिअ जाई। ईसु काहि धौं देइ बड़ाई॥लखन कहा जस भाजनु सोई। नाथ कृपा तव जापर होई॥1॥भावार्थ:- चलकर सीताजी के स्वयंवर को देखना चाहिए। देखें ईश्वर किसको बड़ाई देते हैं। लक्ष्मणजी ने कहा- हे नाथ! जिस पर आपकी कृपा होगी, वही 

बालकांड दोहा 239

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चौपाई :नृप सब नखत करहिं उजिआरी। टारि न सकहिं चाप तम भारी॥कमल कोक मधुकर खग नाना। हरषे सकल निसा अवसाना॥1॥भावार्थ:- सब राजा रूपी तारे उजाला (मंद प्रकाश) करते हैं, पर वे धनुष रूपी महान अंधकार को हटा नहीं सकते। रात्रि का अंत होने से जैसे क

बालकांड दोहा 238

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चौपाई :घटइ बढ़इ बिरहिनि दुखदाई। ग्रसइ राहु निज संधिहिं पाई॥कोक सोकप्रद पंकज द्रोही। अवगुन बहुत चंद्रमा तोही॥1॥भावार्थ:- फिर यह घटता-बढ़ता है और विरहिणी स्त्रियों को दुःख देने वाला है, राहु अपनी संधि में पाकर इसे ग्रस लेता है। चकवे क

बालकांड दोहा 237

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चौपाई :हृदयँ सराहत सीय लोनाई। गुर समीप गवने दोउ भाई॥राम कहा सबु कौसिक पाहीं। सरल सुभाउ छुअत छल नाहीं॥1॥भावार्थ:- हृदय में सीताजी के सौंदर्य की सराहना करते हुए दोनों भाई गुरुजी के पास गए। श्री रामचन्द्रजी ने विश्वामित्र से सब कुछ क

बालकांड दोहा 236

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चौपाई :सेवत तोहि सुलभ फल चारी। बरदायनी पुरारि पिआरी॥देबि पूजि पद कमल तुम्हारे। सुर नर मुनि सब होहिं सुखारे॥1॥भावार्थ:- हे (भक्तों को मुँहमाँगा) वर देने वाली! हे त्रिपुर के शत्रु शिवजी की प्रिय पत्नी! आपकी सेवा करने से चारों फल सुलभ