बालकांड दोहा 243
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चौपाई :सहज मनोहर मूरति दोऊ। कोटि काम उपमा लघु सोऊ॥सरद चंद निंदक मुख नीके। नीरज नयन भावते जी के॥1॥भावार्थ:- दोनों मूर्तियाँ स्वभाव से ही (बिना किसी बनाव-श्रृंगार के) मन को हरने वाली हैं। करोड़ों कामदेवों की उपमा भी उनके लिए तुच्छ है।