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बालकांड दोहा 251

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चौपाई :भूप सहस दस एकहि बारा। लगे उठावन टरइ न टारा॥डगइ न संभु सरासनु कैसें। कामी बचन सती मनु जैसें॥1॥भावार्थ:- तब दस हजार राजा एक ही बार धनुष को उठाने लगे, तो भी वह उनके टाले नहीं टलता। शिवजी का वह धनुष कैसे नहीं डिगता था, जैसे कामी पुरु

बालकांड दोहा 250

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चौपाई :नृप भुजबल बिधु सिवधनु राहू। गरुअ कठोर बिदित सब काहू॥रावनु बानु महाभट भारे। देखि सरासन गवँहिं सिधारे॥1॥भावार्थ:- राजाओं की भुजाओं का बल चन्द्रमा है, शिवजी का धनुष राहु है, वह भारी है, कठोर है, यह सबको विदित है। बड़े भारी योद्धा 

बालकांड दोहा 249

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चौपाई :राम रूपु अरु सिय छबि देखें। नर नारिन्ह परिहरीं निमेषें॥सोचहिं सकल कहत सकुचाहीं। बिधि सन बिनय करहिं मन माहीं॥1॥भावार्थ:- श्री रामचन्द्रजी का रूप और सीताजी की छबि देखकर स्त्री-पुरुषों ने पलक मारना छोड़ दिया (सब एकटक उन्हीं को 

बालकांड दोहा 248

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चौपाई :चलीं संग लै सखीं सयानी। गावत गीत मनोहर बानी॥सोह नवल तनु सुंदर सारी। जगत जननि अतुलित छबि भारी॥1॥भावार्थ:- सयानी सखियाँ सीताजी को साथ लेकर मनोहर वाणी से गीत गाती हुई चलीं। सीताजी के नवल शरीर पर सुंदर साड़ी सुशोभित है। जगज्जननी

बालकांड दोहा 247

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चौपाई :सिय सोभा नहिं जाइ बखानी। जगदंबिका रूप गुन खानी॥उपमा सकल मोहि लघु लागीं। प्राकृत नारि अंग अनुरागीं॥1॥भावार्थ:- रूप और गुणों की खान जगज्जननी जानकीजी की शोभा का वर्णन नहीं हो सकता। उनके लिए मुझे (काव्य की) सब उपमाएँ तुच्छ लगती 

बालकांड दोहा 246

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चौपाई :ब्यर्थ मरहु जनि गाल बजाई। मन मोदकन्हि कि भूख बुताई॥सिख हमारि सुनि परम पुनीता। जगदंबा जानहु जियँ सीता॥1॥भावार्थ:- गाल बजाकर व्यर्थ ही मत मरो। मन के लड्डुओं से भी कहीं भूख बुझती है? हमारी परम पवित्र (निष्कपट) सीख को सुनकर सीताज

बालकांड दोहा 245

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चौपाई :प्रभुहि देखि सब नृप हियँ हारे। जनु राकेश उदय भएँ तारे॥असि प्रतीति सब के मन माहीं। राम चाप तोरब सक नाहीं॥1॥भावार्थ:- प्रभु को देखकर सब राजा हृदय में ऐसे हार गए (निराश एवं उत्साहहीन हो गए) जैसे पूर्ण चन्द्रमा के उदय होने पर ता

बालकांड दोहा 244

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चौपाई :कटि तूनीर पीत पट बाँधें। कर सर धनुष बाम बर काँधें॥पीत जग्य उपबीत सुहाए। नख सिख मंजु महाछबि छाए॥1॥भावार्थ:- कमर में तरकस और पीताम्बर बाँधे हैं। (दाहिने) हाथों में बाण और बाएँ सुंदर कंधों पर धनुष तथा पीले यज्ञोपवीत (जनेऊ) सुशोभ