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बालकांड दोहा 331

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चौपाई :दंड प्रनाम सबहि नृप कीन्हे। पूजि सप्रेम बरासन दीन्हे॥चारि लच्छ बर धेनु मगाईं। काम सुरभि सम सील सुहाईं॥1॥ भावार्थ:- राजा ने सबको दण्डवत्‌ प्रणाम किया और प्रेम सहित पूजन करके उन्हें उत्तम आसन दिए। चार लाख उत्तम गायें मँगवा

बालकांड दोहा 330

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चौपाई :नित नूतन मंगल पुर माहीं। निमिष सरिस दिन जामिनि जाहीं॥बड़े भोर भूपतिमनि जागे। जाचक गुन गन गावन लागे॥1॥ भावार्थ:- जनकपुर में नित्य नए मंगल हो रहे हैं। दिन और रात पल के समान बीत जाते हैं। बड़े सबेरे राजाओं के मुकुटमणि दशरथजी जा

बालकांड दोहा 329

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चौपाई :पंच कवल करि जेवन लागे। गारि गान सुनि अति अनुरागे।भाँति अनेक परे पकवाने। सुधा सरिस नहिं जाहिं बखाने॥1॥ भावार्थ:- सब लोग पंचकौर करके (अर्थात ‘प्राणाय स्वाहा, अपानाय स्वाहा, व्यानाय स्वाहा, उदानाय स्वाहा और समानाय स्वाहा’ इ

बालकांड दोहा 328

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चौपाई :पुनि जेवनार भई बहु भाँती। पठए जनक बोलाइ बराती॥परत पाँवड़े बसन अनूपा। सुतन्ह समेत गवन कियो भूपा॥1॥ भावार्थ:- फिर बहुत प्रकार की रसोई बनी। जनकजी ने बारातियों को बुला भेजा। राजा दशरथजी ने पुत्रों सहित गमन किया। अनुपम वस्त्रो

बालकांड दोहा 327

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चौपाई :स्याम सरीरु सुभायँ सुहावन। सोभा कोटि मनोज लजावन॥जावक जुत पद कमल सुहाए। मुनि मन मधुप रहत जिन्ह छाए॥1॥ भावार्थ:- श्री रामचन्द्रजी का साँवला शरीर स्वभाव से ही सुंदर है। उसकी शोभा करोड़ों कामदेवों को लजाने वाली है। महावर से य

बालकांड दोहा 326

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चौपाई :जसि रघुबीर ब्याह बिधि बरनी। सकल कुअँर ब्याहे तेहिं करनी॥कहि न जा कछु दाइज भूरी। रहा कनक मनि मंडपु पूरी॥1॥ भावार्थ:- श्री रामचन्द्रजी के विवाह की जैसी विधि वर्णन की गई, उसी रीति से सब राजकुमार विवाहे गए। दहेज की अधिकता कुछ क

बालकांड दोहा 325

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चौपाई :कुअँरु कुअँरि कल भावँरि देहीं। नयन लाभु सब सादर लेहीं॥जाइ न बरनि मनोहर जोरी। जो उपमा कछु कहौं सो थोरी॥1॥ भावार्थ:- वर और कन्या सुंदर भाँवरें दे रहे हैं। सब लोग आदरपूर्वक (उन्हें देखकर) नेत्रों का परम लाभ ले रहे हैं। मनोहर जो

बालकांड दोहा 324

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चौपाई :जनक पाटमहिषी जग जानी। सीय मातु किमि जाइ बखानी॥॥सुजसु सुकृत सुख सुंदरताई। सब समेटि बिधि रची बनाई॥1॥ भावार्थ:- जनकजी की जगविख्यात पटरानी और सीताजी की माता का बखान तो हो ही कैसे सकता है। सुयश, सुकृत (पुण्य), सुख और सुंदरता सबको